बारिश तो देखी ही होगी आपने...
कभी रिमझिम, तो कभी मूसलाधार!
मानसून की बारिश,
शीत की बारिश,
और बेमौसम बारिश...
लगातार बारिश से नदियों में बाढ़ आ जाती है,
बह जाते हैं लोग, पेड़-पौधे, फसलें और घर-द्वार।
पर क्या आपने देखी है किसी के भीतर की बारिश...?
भीतर की बारिश से
सारा तन-मन भीग जाता है,
ढह जाती हैं अहम की दीवारें,
टूट-टूट कर बह जाती हैं बंदिशों की चट्टानें।
मौसम विज्ञानी अनुमान लगा सकते हैं उस बारिश का,
पर इस बारिश का केवल अहसास ही होता है।
यह बारिश है हर मौसम की,
यह सुहाती है रिमझिम भी, मूसलाधार भी...
जितनी ज़रूरी होती है वह बारिश—
खेतों के लिए, पीने के लिए, जीने के लिए,
उतनी ही ज़रूरी है यह बारिश—
आदमी को 'आदमी' होने के लिए...!
-- नरेन्द्र कुमार कुलमित्र
02.03.23
9755852479
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