बहुत सताया तुमने,
बहुत दिल दुखाया तुमने।
लोगों ने जी भरकर देखी
और भोगी है तुम्हारी तानाशाही।
तुम मुगालते में जीते रहे
कि सत्ता तुम्हारी बपौती है;
हर आततायी का एक दिन
अंत होता ही है—
काश! तुम यह समझ गए होते।
काश! कि तुममें इतनी इंसानियत होती
कि तुम्हारे जाने पर
थोड़ा-सा दुख हो पाता।
तुम इतने निकृष्ट कैसे हो सकते थे
कि तुम्हारे लिए
हमेशा बद्दुआएँ और गालियाँ ही निकलती रहीं।
हम कतई नहीं चाहते
कि कहीं आते-जाते,
सड़क, चौक-चौराहे पर
तुम्हारी मनहूसियत से भरा चेहरा
हमें फिर कभी दिखाई दे।
हम नहीं चाहते
कि तुम हमें दोबारा कभी याद आओ।
हम धीरे-धीरे
एक बुरे सपने की तरह
तुम्हें भूल जाएँगे।
हम फिर भी चाहेंगे
कि तुम्हारे इस पतन से
तुम्हारे भीतर की गैरत जागे
और तुम
थोड़ा आदमी बनने की
कोशिश कर सको...
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