(लघुकथा)
अड़सठ साल का सूरज अपनी उम्र के इस पड़ाव पर लगभग अकेला पड़ चुका था। जीवन भर साथ देने का वादा करने वाली उसकी अर्धांगिनी दो साल पहले ही इस दुनिया से विदा हो गई थी। आज सुबह-सुबह समाचार-पत्र पढ़ते हुए उसके मन में थोड़ी उदासी थी, तो थोड़ी प्रसन्नता भी। चार अक्टूबर की तारीख ने उसे अतीत की गलियों में पहुँचा दिया।
यादों में डूबा सूरज सोच रहा था कि पढ़ाई के दिनों में और फिर अपने अध्यापकीय जीवन में चार अक्टूबर का दिन आते ही वह कितना खुश हो जाया करता था। घर-परिवार के लोग, दोस्त-यार और सहकर्मी उसे गले लगाकर जन्मदिन की बधाई देते थे। रेस्टोरेंट में प्रेमिका मिलती, ‘आई लव यू’ कहती, प्यार से चूमती और कोई खूबसूरत-सा उपहार थमा देती। ‘हैप्पी बर्थडे’ लिखी सजावटी सामग्रियों और रंग-बिरंगे गुब्बारों से कमरा सजा दिया जाता। ‘हैप्पी बर्थडे’ गीत पर पत्नी और बच्चे मिलकर नाचते। दीपक जलाकर आरती उतारी जाती, माथे पर रोली लगाई जाती और बड़े उत्साह के साथ केक काटा जाता।
ऐसे मौकों पर दोस्त भी अपनी वाली पार्टी लेने से कहाँ चूकते थे! उन्हें तो नॉनवेज खाने के साथ व्हिस्की, रम या बीयर चाहिए होती थी। उन दिनों सबको उसका जन्मदिन याद रहता था। लेकिन आज... आज उसे जन्मदिन पर याद करने वाला कोई नहीं था।
उसे आज उस सच की साक्षात अनुभूति हो रही थी—उगते हुए सूरज को सब प्रणाम करते हैं, डूबते हुए सूरज को कोई नहीं।
रात के दस बज चुके थे। खिन्न मन से सूरज सोने की तैयारी कर ही रहा था कि तभी उसके मोबाइल की घंटी बजी। अनजान नंबर था। उसने फोन उठाया।
“हम एलआईसी से बोल रहे हैं, सूरज जी। आपको जन्मदिन की बहुत-बहुत बधाई!”
कुछ क्षणों के लिए सूरज जैसे स्तब्ध रह गया। फिर उसके उदास चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान खिल उठी।
शायद आज पहली बार उसे यह एहसास हुआ कि याद करने के लिए रिश्ते ही जरूरी नहीं होते, कभी-कभी एक अनजान आवाज भी अकेलेपन की दीवार में छोटी-सी खिड़की खोल देती है।
--नरेंद्र कुमार कुलमित्र
9755852479
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