हम जो कहते हैं
वही सुने जाते हैं,
उसी से अर्थ निकाले जाते हैं,
उसी से बात बनती है,
उसी से बखेड़े खड़े होते हैं।
यह जरूरी नहीं कि
हम जो कहते हैं,
उसका वही अर्थ निकाला जाए।
उसका वह अर्थ भी निकाला जा सकता है
जो हम बिल्कुल भी नहीं करना चाहते।
कई बार कहे जाने पर अफसोस होता है,
कई बार कहे जाने पर नाज़ होता है,
कई बार कहकर फँस जाते हैं,
कई बार कहकर फँसने से बच जाते हैं।
हम कई बार सोचते हैं,
मगर कह नहीं पाते।
कहे जाने पर क्या सोचा जाएगा,
यह सोचकर कहने से रह जाते हैं।
कई बार “जो होगा, देखा जाएगा” सोचकर
कह डालते हैं जो कहना होता है।
ऐसे में कई बार बन जाता है काम,
कई बार बुरी तरह बिगड़ जाता है काम।
कहते हैं कि कहने से पहले
सोचा जाना चाहिए,
पर सोचते-सोचते कई बार
कहा नहीं जाता।
कहे जाने के लिए यह जानना जरूरी होता है
कि कब कहा जाए,
कैसे कहा जाए
और कितना कहा जाए।
अलग-अलग समय में
दोनों ही खतरनाक होते हैं—
कहा जाना
और न कहा जाना।
-- नरेन्द्र कुमार कुलमित्र
9755852479
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