अचानक आ धमकती हैं
बाढ़ की तरह हरहराकर बहा लेना चाहती हैं
संभलने का ज़रा भी मौका नहीं देतीं
हम अकबका जाते हैं
हमारे विवेक की बत्ती गुल हो जाती है
मगर बाहों को कसकर
सांसों को थामकर
पांवों को जमाकर
धैर्य बांधकर
थोड़ी देर अडिग खड़े रहने से
मुसीबतें हमसे दूर चली जाती हैं...
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