Tuesday, 18 August 2026

शोकातुर लोग : जन सरोकार की कविताएँ 20.02.23

शोकातुर लोग : जन सरोकार की कविताएँ
कृति : शोकातुर लोग (कविता-संग्रह)
कवि : समयलाल विवेक
प्रकाशक : नोशन प्रेस, 2022

वरिष्ठ कवि एवं पत्रकार समयलाल विवेक का शोकातुर लोग सद्यः प्रकाशित काव्य-संग्रह है। यह उनका पहला काव्य-संग्रह है, जिसमें संकलित कविताओं में उनके सुदीर्घ जीवनानुभवों को महसूस किया जा सकता है। इस संग्रह में कुल पैंसठ कविताएँ सम्मिलित हैं। अधिकांश कविताएँ आकार में छोटी हैं, मगर उनकी भावभूमि अत्यंत गहरी है। उनकी कविताएँ जीवन से जुड़ी हैं, जिनमें जीवन के लगभग सभी रंग दिखाई देते हैं। उनकी कविताओं में प्रेम है, पीड़ा है, खीझ है और गहरा आक्रोश भी। तमाम प्रकार की भावनात्मक उथल-पुथल से भरी उनकी कविताओं में पलायन कहीं भी नहीं है। उनकी कविताएँ डटकर अपने और अपने लोगों की बात कहती नजर आती हैं। इस संग्रह में प्रकाशित कविताओं को हम उनके चालीस-पैंतालीस वर्षों के जीवनानुभवों का निचोड़ कह सकते हैं।
यह सच है कि कवि जितना सहृदय होता है, उतनी ही उसमें प्रतिरोध की क्षमता भी होती है। इसीलिए विवेक अपने लोगों पर कविता लिखते समय जितने भावुक नजर आते हैं, उतने ही शोषण-तंत्र पर लिखते हुए आक्रोशित और कठोर भी दिखाई देते हैं। कवि गहरे यथार्थ से जुड़े हुए हैं। वे अपनी कविताओं में कहीं भी हवा-हवाई बातें नहीं करते। अपने युग से संपृक्तता कवि का अनिवार्य गुण होती है। विवेक की कविताओं में युगबोध और लोकचेतना का भाव आद्यंत समाहित है। वे अपने आसपास से ही कविता के लिए उपादान ढूँढ़ लेते हैं। अपनी कविताओं के जरिए वे गाँव-गँवई, खेत-खलिहान, गरीब किसान और मजदूर आदि की बात करते हैं। यानी उनकी कविताएँ ग्रामीण संस्कृति और जनजीवन के पक्ष में खड़ी नजर आती हैं।
लोकधर्मिता का भाव उनकी कविताओं में यत्र-तत्र बिखरा हुआ है। यदि रचनाकार केवल निजी प्रेम या काल्पनिक बातों पर ही लिखता रहे तो उसके कवि-कर्म और लेखकीय धर्म पर सवाल उठना स्वाभाविक है। जब देश और दुनिया में दहकती हुई ज्वलंत घटनाएँ घट रही हों, ऐसे में कोई चेतस रचनाकार केवल और केवल स्व पर केंद्रित आत्ममुग्धता में कैसे जी सकता है? विवेक की कविताओं में लोक की पीड़ा स्व-पीड़ा बन जाती है। शोकातुर लोग इस काव्य-संग्रह की शीर्षक कविता है। इस कविता में मृत्यु के बहाने लोकजीवन में प्रचलित मृत्यु-संस्कार और उसके क्रिया-कर्म को बिंबात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया है। लोक में मृतक के लिए ‘नहाऊर’ निकलने की परंपरा प्रचलित है। शोकग्रस्त परिजन कतारबद्ध होकर एक साथ नहाने जाते हैं और एक साथ लौटते हैं। नहाऊर की कतार को आते देखकर लोग रास्ता दे देते हैं और किनारे खड़े हो जाते हैं—
“खोर बहारतीं बेटियाँ
डेहरी लिपती बहुएँ और
धूल के घरौंदे बनाते नंग-धड़ंग बच्चे
सब ओट में हो
रास्ता छोड़ते गए नहाऊर के लिए।”
(पृ. 3)
इस कविता में धर्म और मृत्यु-संस्कार के नाम पर पंडों द्वारा किए जाने वाले लूट-खसोट तथा लोगों को मूर्ख बनाए जाने की रस्म पर भी व्यंग्य किया गया है—
“पहुंचते-पहुंचते बिलासपुर, कटनी या नैनी
पहचान लिया जाएगा वह और
लग जाएंगे उसके पीछे
रघुवीर, महावीर, जगन्नाथ और
जाने किस-किस नाम के पंडे के गुमाश्ते।
उसके आजा, बाबा, दादा, परदादा, पास-पड़ोस
और मठाधीशों के नाम जो गिनाएगा
बन रहेगा मझला उसी का मुर्गा।”
(पृ. 5)
संग्रह की कविताओं में कवि का जनवादी स्वर मुखरित हुआ है। वे इस कविता-संग्रह की ‘अपनी बात’ में यह स्वीकार करते हैं कि, “रचना चाहे किसी भी विधा में लिखी गई हो, यदि जनवादी (छद्म नहीं) है तो वह आम व खास पाठकों को एकाधिक बार पढ़ने के लिए जरूर बाध्य करेगी।” इस कथन के संदर्भ में मुझे लगता है कि एक ईमानदार रचनाकार में जनवादी गुण होना आवश्यक है। उनकी कविता ओ काया में यही जनवादी तथा प्रगतिवादी स्वर समाहित है, जिसमें पीड़ितों की सेवा करने और पीड़कों को राख कर देने का आह्वान किया गया है—
“माचिस बन
ओ काया
अंतस में धर आग की अनेक तीलियाँ
फिर एक-एक कर सुलग
पीड़क को राख कर
पीड़ित की सेवा।”
(पृ. 6)
कोई भी देश और वहाँ की जनता अभिन्न होते हैं। देश लोगों से बनता है और लोगों से ही देश बनता है। देश आगे बढ़ जाए और लोग पीछे रह जाएँ अथवा लोग आगे बढ़ जाएँ और देश पीछे रह जाए, तो यह विरोधाभासपूर्ण स्थिति विडंबनापूर्ण ही कही जाएगी। कवि इस विडंबना को देश और लोग कविता में इस प्रकार व्यक्त करते हैं—
“आज देश जरूरत से ज्यादा
आगे बढ़ गया है
हम बहुत ही पीछे छूट गए हैं
कैसा यह देश
कैसे हैं लोग
कुछ भी तो नहीं आता समझ में
आखिर तुम ही बताओ हम क्या करें
क्या न करें ताकि
हमेशा-हमेशा के लिए देश और लोगों में
बना रहे तालमेल।”
(पृ. 14-15)
कवि तथाकथित महापुरुषों को भी अपनी कविता के माध्यम से कड़े शब्दों में खबरदार करते हुए नजर आते हैं, जो अब तक जीवन और सृष्टि के बारे में घिसी-पिटी, रटी-रटाई बातें करते आ रहे हैं। जिनकी बातों में न तो नवीनता है और न ही वैज्ञानिकता। महापुरुषों खबरदार कविता की पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं—
“महापुरुषों खबरदार
यहाँ बंद हो चुके हैं संभावनाओं के सब द्वार
अब देखना नहीं इधर कभी मुड़कर
महापुरुषों, बंद करो बकवास
जीवन-मर्म, सृष्टि-संरचना और
संचालन की वही बातें दोहराओगे
और कितनी बार
सुन-सुन हमारे कान पक गए हैं।”
(पृ. 16)
जीवन में मौन रहने का अपना महत्व हो सकता है, लेकिन जहाँ बोला जाना चाहिए, वहाँ भी मौन साधे बैठे रहना उचित नहीं है। अन्याय और अनीति को अपनी आँखों के सामने देखते हुए सुधीजनों का मौन रह जाना महाभारत जैसी त्रासदी का कारण बना था। आज देश भी अनेक प्रकार की विडंबनापूर्ण परिस्थितियों से गुजर रहा है। मगर बुद्धिजीवी और कलमकार सत्ता के पोषकों के खिलाफ लिखने और कुछ कहने से डर रहे हैं। मौन की भाषा कविता का अंश प्रस्तुत है—
“अनगिनत अबोले, अलिखित
शब्दों की मजबूत
तालाबंद पिटारी है मौन
चाबी है तो खोलो
वरना इसे तोड़ो।”
(पृ. 17)
संसार में फैली असमानता को देखकर कवि का मन क्षुब्ध हो जाता है। ऐसा क्यों है कि देश की समृद्धि और खुशहाली कुछ गिने-चुने लोगों के हिस्से में आती है? रोशनी पर चंद लोगों ने अधिकार जमा लिया है और बाकी सब अंधेरे में जीने के लिए अभिशप्त हैं। हमारा कसूर क्या है कविता में कवि सूरज से ही इसका उत्तर माँगता है—
“आना तो सूरज
सार्वजनिक इस सृष्टि-खंड पर
किसी दिन
भेष बदलकर
फिर बताना हमें कि
तुम जो भी बिखेरते हो सोन-किरणें
वह क्यों नहीं पहुँचती हम तक
हमारा कसूर क्या है।”
कवि का ईश्वर के अस्तित्व पर संदेह करना गैरवाजिब नहीं है। ईश्वर के नाम पर पाखंड हो रहा हो और तमाम गुणों से विभूषित ईश्वर का अता-पता न हो, ऐसे में एक संजीदा रचनाकार द्वारा ईश्वर के अस्तित्व पर संदेह करना स्वाभाविक ही है। ईश्वर कविता की पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं—
“रहने को तो
धर्मग्रंथों,
संतों की वाणी,
बच्चों की किताब,
अनभिज्ञों के दिल-दिमाग,
मंदिर, मस्जिद,
गिरजाघर, गुरुद्वारे में हो,
नहीं हो तो बस आतताइयों के पास।
हे ईश्वर, देर से आने का
क्या फायदा।”
यूं तो जीने की चाहत हर प्राणी में होती है, मगर दूसरे के हित के लिए जीने की इच्छा रखना हर किसी के वश की बात नहीं है। इसके लिए विराट हृदय और उदार दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है। आज उपभोक्तावादी संस्कृति के चंगुल में फँसा मनुष्य ‘परहित सरिस धरम नहिं भाई’ की भावना को भूलता जा रहा है। असंवेदनशील होते समाज और लोगों के लिए कवि की लालसा कविता बेहद प्रासंगिक है—
“पीपल का सूखा पत्ता मैं
मेरा हरापन लौट आता
किसी गर्भवती बकरी के मुँह में
समा जाने की
लालसा है बस।”
(पृ. 32-33)
पर्यावरण की चिंता आज वैश्विक चिंता बन गई है। विकास के लिए जरूरी शहरीकरण और औद्योगीकरण अब कई बार विनाश का कारण बनने लगे हैं। पर्यावरण के लिए सबसे जरूरी पेड़ काटे जा रहे हैं और जंगल सिमटते जा रहे हैं। ऐसे हालात में एक संजीदा कवि बचपन में पेड़ों के साथ बिताए पलों को याद करता है—
“कितने ही नामों से
पेड़ तुझे याद करें
तुमने ही जमीन से ऊपर उठाया
आसमान दिखाया।”
(पृ. 35)
बाजारवाद के इस दौर में लुटेरा और शिकारी जैसे शब्द बाजार के पर्यायवाची प्रतीत होने लगे हैं। कवि अपनी कविता लूटेरे के माध्यम से लोगों को मायावी बाजार के भ्रमजाल से बचने के लिए आगाह करता है—
“चाहते हो यदि
अपनी सलामती तो
चुपचाप निकल लो
इस बेरहम बाजार से
वरना फँस जाओगे
मक्खी जैसे मकड़जाल में।”
(पृ. 42)
कवि को अपने युगीन समय की बड़ी चिंता है। असंवेदनशील समय को देखकर कवि गहरी चिंता में डूब जाता है और वही चिंता उसकी कविताओं में प्रस्फुटित होती है। सोख्ता समय आकार में छोटी कविता है, मगर इसमें समय की गहरी चिंता समाहित है—
“लोग सच ही
कहते हैं
सोख्ता समय है
शनैः-शनैः
धरती के सत्व को
सोख रहा वही।”
कवि को हम हथियारबंद सिपाही कहें तो कविता उसका हथियार होती है। कवि अपनी कविता के माध्यम से लोगों की धारणाओं और विचारों को बदलने की क्षमता रखता है। करिश्मा कविता में कविता के इसी महत्व की ओर संकेत किया गया है—
“कवि ने
लिखी कविता
वह जादू की छड़ी बन गई
उस छड़ी ने
दिखाना शुरू किया करिश्मा
कवि ने
जैसा चाहा
संसार को बदल दिया।”
(पृ. 54)
इसी तरह चिंगारी की मानिंद कविताएँ शीर्षक कविता में कविता की अमरता को चित्रित करते हुए कवि लिखते हैं—
“दुनिया में
कुछ भी नहीं बचेगा
तब भी बची रहेंगी
राख के ढेर में
चिंगारी की मानिंद कविताएँ।”
कवि बाह्य आडंबर करने वाले तथाकथित धार्मिकों को अपनी कविता में जोरदार ढंग से लताड़ता है। शब्दों के माध्यम से आडंबर और पाखंड पर प्रहार करने की परंपरा लेखकों और कवियों की प्रमुख विशेषताओं में रही है। विवेक की कविता सबसे बड़ा विषधर में यह खूबी तीक्ष्णता के साथ दिखाई देती है—
“उसने जो हृष्ट-पुष्ट शरीर पर
रंग-बिरंगा झकास वस्त्र सजाया है
माथे पर चंदन-तिलक लगाया है
सफाचट या लंबे घने केशों वाला
दिन-रात चेले-चपाटियों से घिरा
सदा सिंहासन पर विराजमान
वही है देव का अवतार
बाकी सब दीन-हीन, सेवक बेकार
वही है जनाब धरती का
सबसे बड़ा विषधर।”
(पृ. 63)
अभिजात्य शोषक वर्ग के प्रति आक्रोश प्रकट करते समय कवि के शब्दों में भाषाई भदेसपन भी स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। विडंबनात्मक परिस्थितियों से उपजी अपनी भावनाओं को यथावत व्यक्त करने के लिए भाषाई भदेसपन से उन्हें जरा भी गुरेज नहीं है—
“उठते-बैठते
चलते-फिरते
जागते-सोते
दिन-रात
जोरदार हम
तुम पर
पादते हैं।”
(पृ. 69)
लोकतंत्र में यदि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता न हो तो उसे लोकतंत्र क्योंकर कहा जाए? सब कुछ देखते-सुनते हुए भी गूँगे-बहरे की तरह प्रतिक्रिया न कर पाना लोकतंत्र की पहचान नहीं हो सकती। परिस्थितिजन्य विवशता भले ही हो सकती है, पर सामयिक हालात के प्रति लोगों में आक्रोश भरा हुआ है। कवि अपनी कविता गूँगा बहरा आदमी में भाषाई भदेसपन के साथ इसी स्थिति की ओर संकेत करता है—
“चमकीली आँखों से वह
भाँप लेता है
हर मन की बात
मुस्कराकर
अपनी बेबसी बताता है
गूँगा बहरा आदमी
उसे कभी मत दिलाना गुस्सा
नहीं तो वह खंखारकर थूक देगा
तुम्हारे चेहरे पर।”
(पृ. 71-72)
कवि अपनी कविता अखबार के लोग में पत्रकारिता के महत्व को बड़ी संजीदगी के साथ व्यक्त करता है—
“अखबार के लोग
सृष्टि के पहरेदार हैं
अखबार के लोग
पानी, रोशनी और हवा हैं
उनकी पहुँच सब जगह है
अखबार के लोग
अपना पेट रोटी से नहीं
खबरों से भरते हैं।”
(पृ. 77-78)
अव्यवस्था और विसंगति के प्रति उनकी कविताओं में आक्रोश का भाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। अपनी कविता इक्कीसवीं सदी का गीत में वे अव्यवस्था के लिए जिम्मेदार लोगों को सबक सिखाने की बात करते हैं। पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं—
“बहुत सहे, अब हम न सहेंगे
मर-मर के अब हम न जिएँगे
बदहाल किया है जिसने हमें
उसको हम सबक सिखाएँगे
कभी न धरती दरक सकेगी
कभी न टूटेगा आकाश।”
(पृ. 93)
इसी तरह क्रांति गीत कविता में समाजवाद का समर्थन करते हुए कवि बदलाव के लिए शोषकों को तोड़ने और पीड़ितों को एकजुट करने का आह्वान करता है—
“क्रांति गीत गाते
लहराते ध्वज लाल
तोड़ते चले, जोड़ते चले।”
और आगे—
“आएगा समाजवाद
भरसक प्रयास करें
लुटते चलें, बाँटते चलें
कदम-कदम....”
(पृ. 96-97)
कविता-संग्रह की अंतिम कविता खट्टा-मीठा बचपन में कवि अपने बचपन की यादों को शब्दों में समेटने का प्रयास करता है। किसी साहित्यकार के पास ही यह विशिष्ट कौशल होता है कि वह अपनी रचना-विधा में अपनी बीती यादों को शब्दबद्ध कर उन्हें बार-बार जी लेने का अवसर बना ले। कवि की इस कविता के माध्यम से हम उसके बचपन के खेलों और क्रियाकलापों से रूबरू होते हैं—
“तब उसी के संग हम खेला करते
घानीमुनि, तियो, टीप, चूड़ी लुकौला,
आँख-मुंदौला, नदी-पहाड़, भुनुन, कौन सारंग,
चाल गोटी, तिरी चौक, कुकुर-बिलई,
अंधियारी-अंजोरी, घोर-घोर रानी, चिंगरी,
बरबट्टी, फुम्मे फू..”
इस तरह हम देखते हैं कि कवि के भाव-पक्ष में उसका पूरा परिवेश समाहित है। इसमें उसकी रोजमर्रा की जिंदगी है, घर है, परिवार है, समाज है, तमाम समस्याएँ हैं, देशभक्ति और थोथे राष्ट्रवाद पर सवाल हैं तथा नदी-पहाड़ के साथ जुड़ी खूबसूरत प्रकृति भी है। उनके कहन में सादगी है और कहीं भी बनावट नहीं है। उनकी कविताओं में परिस्थितिजन्य करुणा है, विभत्सता है और विस्मय भी है। कविता की भाषा बेहद सहज, सरल और आम बोलचाल की है। सादृश्य-विधान के अंतर्गत उपमा अलंकार का प्रयोग अनायास और स्वाभाविक रूप से हुआ है। कविताओं में दृश्य और श्रव्य बिंबों का पर्याप्त प्रयोग हुआ है। उनकी अधिकांश कविताएँ लोकभावना और जनसरोकार पर केंद्रित हैं, इसलिए पाठक उनकी कविताओं से बड़ी सरलता और सहजतापूर्वक जुड़ सकते हैं। यही शोकातुर लोग की सबसे बड़ी विशेषता है कि इसमें कवि अपने समय और समाज से विमुख होकर कविता नहीं रचता, बल्कि अपने आसपास के जीवन, लोक, श्रम, संघर्ष, प्रकृति, राजनीति, व्यवस्था और मनुष्य की पीड़ा को अपनी रचनात्मक संवेदना का आधार बनाता है। लगभग चार-पैंतालीस वर्षों के जीवनानुभवों से निकली ये कविताएँ अपने समय की बेचैनी, जनजीवन की पीड़ा और परिवर्तन की आकांक्षा को स्वर देती हैं। इस अर्थ में शोकातुर लोग केवल शोक की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि शोक से प्रतिरोध और प्रतिरोध से बेहतर समाज की तलाश की कविताएँ भी हैं।
नरेंद्र कुमार कुलमित्र
कवर्धा, छत्तीसगढ़
मो. 9755852479

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