अपनी खुशियों को खुशियों की तरह,
ना उदासियों को उदासियों की तरह।
ना विवशताओं को विवशताओं की तरह,
ना प्रेम को प्रेम, ना घृणा को घृणा की तरह।
कभी नहीं उकेर पाता
अपनी पीड़ा को पीड़ा की तरह।
खुद को कभी
पूरा का पूरा व्यक्त नहीं कर पाता,
कागज़ पर लिखे तमाम शब्द
बेबस से नज़र आते हैं...
और आखिरकार,
मैं एक लाचार सा अव्यक्त रह जाता हूँ!
- नरेन्द्र कुमार कुलमित्र
19.01.23
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