कृति : जिंदगी आबाद रहेगी (कविता-संग्रह)
रचनाकार : अजय चंद्रवंशी
प्रकाशक : कबीरा खड़ा बाजार में प्रगतिशील वैचारिक मंच
मूल्य : ₹200
युवा कवि और आलोचक अजय चंद्रवंशी का जिंदगी आबाद रहेगी पहला काव्य-संग्रह है। इससे पूर्व उनका भूख शीर्षक से एक ग़ज़ल-संग्रह प्रकाशित हो चुका है। साहित्यिक विधा की दृष्टि से दोनों कृतियाँ भले ही अलग हैं, लेकिन भावबोध और वैचारिक दृष्टिकोण की दृष्टि से उनमें पर्याप्त समानता दिखाई देती है। किसी भी रचनाकार के लिए विधा से अधिक महत्वपूर्ण उसका कहन, संवेदना और वैचारिक दृष्टिकोण होता है। अजय चंद्रवंशी की रचनात्मकता में यह बात विशेष रूप से दिखाई देती है। किसी भी युवा रचनाकार की रचनात्मक यात्रा प्रायः कविता, ग़ज़ल, गीत अथवा शेरो-शायरी से आरंभ होती है। अजय जी ने भी अपनी रचनात्मक यात्रा में ग़ज़ल और कविता दोनों विधाओं को अपनाया है। वे चाहे ग़ज़ल लिखें या कविता, अपने जीवनानुभवों और अनुभूतियों को बिना किसी लाग-लपेट के सरल, सहज और सीधे शब्दों में अभिव्यक्त करते हैं। मुझे व्यक्तिगत रूप से मुक्तछंद की कविताएँ अपनी बात को यथावत और प्रभावी ढंग से कहने के लिए अधिक उपयुक्त लगती हैं और इस संग्रह में कवि ने मुक्तछंद का सार्थक उपयोग किया है।
इस संग्रह की कविताओं में भावों की विविधता सहज ही देखी जा सकती है। इनमें प्रेम है, आत्माभिव्यक्ति है, किसानों और मजदूरों की पीड़ा है, कहीं हताशा है तो कहीं उम्मीद की किरण; अपने लोगों और अपनी अनुभूतियों की आत्मीयता है; देश, समाज और आसपास की विसंगतियों के प्रति चिंता है; व्यवस्था के प्रति खीझ है और उसके साथ तीखा व्यंग्य भी है। कुल मिलाकर अजय चंद्रवंशी की कविताएँ जीवन की सच्चाइयों से लबरेज और पूर्णतः यथार्थवादी हैं। उनकी कविताओं में कहीं भी झूठे आदर्शवाद अथवा किसी वायवीय दुनिया की छाया दिखाई नहीं देती। उनके शब्द जितने साधारण और सरल हैं, उतने ही तीखे भी हैं। यही सरलता कई बार तथाकथित आदर्शवादियों को सुई की नोक की तरह चुभती है। कवि अपनी कविताओं में पारलौकिक या आध्यात्मिक बातों की दुनिया नहीं रचता, बल्कि जीवन से जुड़ी जरूरी और ज्वलंत समस्याओं को अपनी कविता का विषय बनाता है। उनकी कविताओं में शब्द हैं, लेकिन शब्द-जाल नहीं; शाब्दिक चमत्कार नहीं, बल्कि कहन की सादगी का चमत्कार है।
मैंने अपने स्कूली दिनों में भगवतशरण उपाध्याय का एक प्रसिद्ध निबंध मैं मजदूर हूँ पढ़ा था। उस निबंध में मजदूर को संसार के विकास का सर्जक बताया गया है। सचमुच, दुनिया के निर्माण और विकास में श्रमिक वर्ग की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रही है। धन-दौलत और सत्ता का वैभव समाप्त हो सकता है, लेकिन श्रम और श्रमिक की आवश्यकता कभी समाप्त नहीं हो सकती। अजय चंद्रवंशी की शीर्षक कविता जिंदगी आबाद रहेगी भी इसी जीवन-सत्य की पुष्टि करती है—
“जिंदगी आबाद है
फुटपाथ पर कपड़ा बेचते उस बुजुर्ग के चेहरे में
ग्यारह बजे तक भी काम न मिले उन मजदूरों की उम्मीदों में
जिस्म झुलसाती इस दोपहरी में ठेला पेलते, पैदल चलते,
जद्दोजहद करते इन लोगों में
तुम फैलाओ नफरत, नफरत के सौदागरों
जिंदगी आबाद रहेगी
तुम्हारी जात, मजहब को ठोकर मारती।”
बेबस लोगों की बेबसी को वही व्यक्ति समझ सकता है, जिसके भीतर संवेदना जीवित हो। धनवानों और व्यवस्थादारों के पास प्रायः इन लोगों की जिंदगी को देखने और समझने की फुर्सत नहीं होती। कवि इस उपेक्षित वर्ग की पीड़ा को अपनी कविता में आवाज देता है। शिकायत कविता की पंक्तियाँ इसका सशक्त उदाहरण हैं—
“तुमको शिकायत है कि
मैं कुछ नहीं कहता
मगर ये पथराई आँखें,
ये सूखे होंठ, डगमगाते कदम,
ये जिस्म को छुपाने में नाकाम कपड़े,
रीढ़ को छूता पेट
बहुत कुछ कह रहे हैं
काश, तुम समझ पाते।”
इन पंक्तियों में कवि ने बिना किसी अतिरिक्त अलंकरण के भूख, अभाव और बेबसी को जिस तरह अभिव्यक्त किया है, वह कविता को मार्मिक और प्रभावशाली बनाता है। यहाँ शब्दों से अधिक उन शब्दों के पीछे छिपी हुई पीड़ा बोलती है।
इस संग्रह की अधिकांश कविताएँ मार्क्सवादी विचारधारा और वर्गीय चेतना से प्रभावित दिखाई देती हैं। कवि जहाँ एक ओर गरीब किसानों और मजदूरों के प्रति गहरी सहानुभूति व्यक्त करता है, वहीं दूसरी ओर उनके शोषण के लिए जिम्मेदार व्यवस्था और शक्तियों के प्रति आक्रोश भी प्रकट करता है। वह अपनी कविताओं के माध्यम से शोषित वर्ग को अपने अधिकारों के लिए जागरूक और संघर्षशील होने की प्रेरणा देता है। बेबसी कविता में कवि की यह संवेदना और वर्गीय एकात्मता अत्यंत प्रभावशाली ढंग से सामने आती है—
“मैं भी वही हूँ
जो तुम हो
तुम्हारी आँखों की नमी
मेरी आँखों में है।”
और आगे—
“मगर मेरे भाई,
यह हवा, पानी, ये जमीन हमारा भी है,
हमें छीनना है उनसे
जो हमारा हक छीन कर बैठे हैं।”
इन पंक्तियों में केवल सहानुभूति नहीं, बल्कि प्रतिरोध और अधिकार-बोध का स्वर भी है। कवि शोषित मनुष्य को केवल दया का पात्र नहीं मानता, बल्कि उसे अपने अधिकारों के प्रति सजग और संघर्ष करने वाला मनुष्य मानता है।
अजय चंद्रवंशी की कविताओं में आत्मसम्मान का भाव भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। कवि अपनी सामाजिक और आर्थिक स्थिति को लेकर हीनभावना का शिकार नहीं है। वह श्रम और अपने जीवन से प्रेम करता है तथा अपनी दुनिया पर गर्व करता है। कामन कविता की पंक्तियाँ इस संदर्भ में उल्लेखनीय हैं—
“मगर हम नहीं करते अपनी दुनिया से घृणा
हमें नाज है
अपने-अपने काम, अपने घर, अपने मोहल्ले और अपने लोगों पर।”
यहाँ श्रम के साथ-साथ अपने परिवेश और अपने लोगों के प्रति आत्मीयता एवं स्वाभिमान का भाव दिखाई देता है। यह दृष्टि कवि को अपने पात्रों के और अधिक निकट ले जाती है।
प्रेम मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है, लेकिन आर्थिक अभावों से जूझते व्यक्ति के लिए प्रेम भी कई बार जीवन की प्राथमिकताओं में पीछे छूट जाता है। गरीब की जिंदगी रोजी-रोटी के संघर्ष और छोटी-बड़ी जरूरतों को पूरा करने में ही बीत जाती है। कवि ने इस विडंबना को बहुत सहज ढंग से व्यक्त किया है। मौत कविता का अंश देखिए—
“आती होगी उनको सावन में
अपनी प्रेमिका की याद
हमें तो अपनी टूटी छानही की फिक्र सताती है।”
इन पंक्तियों में प्रेम और अभाव के बीच का अंतर अत्यंत मार्मिक ढंग से सामने आता है। यहाँ कवि किसी कृत्रिम करुणा का निर्माण नहीं करता, बल्कि जीवन की वास्तविकता को सामने रख देता है।
अजय चंद्रवंशी की कविताओं में आदिवासी जीवन की समस्याओं और उनकी अस्मिता का प्रश्न भी महत्वपूर्ण रूप से उपस्थित हुआ है। विकास और पर्यटन के नाम पर आदिवासी क्षेत्रों में बढ़ती बाहरी दखलंदाजी, जल-जंगल-जमीन पर बढ़ते बाजार के दबाव और उनकी संस्कृति के क्षरण को कवि संवेदनशीलता के साथ देखता है। बकौदा के आदिवासी कविता में तथाकथित पर्यटन और संवेदनहीन दृष्टि पर तीखा व्यंग्य किया गया है—
“यह नहीं आते तुम्हारी समस्याओं का हल करने
ये आते हैं यहाँ पिकनिक मनाने,
अपने ऊबे हुए दिनों से कुछ राहत पाने।
ये कैद करते हैं कैमरों में तुम्हारे नंगे जिस्म
और बेचते हैं बाजारों में,
या सजाते हैं अपने ड्राइंग रूम में।
तुम इनके लिए एक तस्वीर से ज्यादा कुछ भी नहीं हो।”
इन पंक्तियों में आदिवासी जीवन को देखने वाली उपभोक्तावादी और पर्यटक मानसिकता पर गंभीर प्रश्न खड़ा किया गया है। कवि आदिवासी को केवल प्रकृति और पर्यटन का हिस्सा मानने वाली दृष्टि का विरोध करता है और उसकी मनुष्यता तथा अस्मिता को केंद्र में रखता है।
जंगल का एक फूल भी एक प्रतीकात्मक कविता है। इसके माध्यम से कवि आदिवासी अस्मिता और अस्मत के प्रति सम्मान की अपील करता है—
“बदलो अपनी नजर,
अपने प्रतिमान,
सम्मान करो उसकी अस्मिता का और फिर देखो
कितनी खुशबू है उसमें
तुम्हारे लिए भी।”
यह कविता केवल आदिवासी जीवन के प्रति संवेदना व्यक्त नहीं करती, बल्कि समाज की दृष्टि और प्रतिमानों में परिवर्तन की आवश्यकता पर भी बल देती है।
कवि अपने परिवेश और परिवेश में उपस्थित व्यक्तित्वों से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। जब कोई संवेदनशील रचनाकार किसी विशिष्ट व्यक्तित्व से प्रभावित होता है तो वह अपनी भावनाओं को शब्द देता है। इस संग्रह की कुछ कविताएँ विशिष्ट व्यक्तित्वों को समर्पित हैं। वानगाग के लिए, गुरुदत्त के लिए (ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है), इजाडोरा के लिए, इमरोज के लिए (प्यार) और साहिर लुधियानवी के लिए जैसी कविताएँ इस दृष्टि से उल्लेखनीय हैं। इन कविताओं में संबंधित व्यक्तित्वों के प्रति कवि का आकर्षण, सम्मान और वैचारिक आत्मीयता दिखाई देती है।
इस संग्रह की कुछ कविताएँ आकार में बहुत छोटी हैं, लेकिन उनमें भावनात्मक गहनता और व्यंग्यात्मक तीक्ष्णता अत्यंत प्रभावशाली है। निर्मोही, मठ भंजक, एक जमीनी कवि, आलिंगन, सत्यवादी, सच्चे वीर, दर्द, बहस, राजनीति, निष्पक्ष, खुद्दार, अनुयायी, तटस्थ और किताबें जैसी छोटी कविताएँ कम शब्दों में बड़ी बात कहने की क्षमता रखती हैं। मठ भंजक में कवि लिखता है—
“वे मठों को तोड़ने आए थे
और उन्होंने एक नया मठ बना लिया।”
राजनीति में—
“वह राजनीति से दूर रहता है
मगर
दूर रहना भी
उसकी एक राजनीति है।”
आलिंगन में—
“उसने गले लगाया...
मैं सहमा नहीं
चीखा!!”
और निष्पक्ष में—
“वह किसी का
पक्ष नहीं लेता
सिवा खुद के।”
इन छोटी कविताओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे पाठक को केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि सोचने के लिए विवश करती हैं। आकार की लघुता के बावजूद अर्थ की व्यापकता इन कविताओं को प्रभावशाली बनाती है।
कविता में व्यंजना का अपना महत्व है। व्यंजना के माध्यम से कही गई बातों को जानकार रचनाकार और सहृदय पाठक अधिक गहराई से ग्रहण करते हैं। दूसरी ओर अभिधामूलक भाषा की अपनी शक्ति है। सीधे और सरल शब्दों में कही गई बात सामान्य पाठक तक भी सहजता से पहुँचती है। झूठे खुदा कविता में कवि ने अभिधामूलक भाषा का प्रभावी प्रयोग किया है—
“जिन्हें रोटी की जरूरत थी
तुमने उन्हें मजहब दिया,
जिन्हें रोजगार की जरूरत थी
उन्हें झूठा आदर्श दिया।”
इसी प्रकार एक सिविल सेवक के लिए कविता में कवि ने सत्ता और पद प्राप्त करने के बाद व्यक्ति के बदलते व्यवहार को सीधे और व्यंग्यपूर्ण ढंग से रेखांकित किया है—
“अब वह चाय ठेलों में नहीं बैठता,
अब फुटपाथ के समोसे उसे अच्छे नहीं लगते,
एक ही ड्रेस को दो दिन पहने
इसकी कल्पना भी नहीं कर सकता।
उसके अंडरवियर तक हमारी कमीज से महंगे होते हैं।”
यहाँ व्यंग्य के माध्यम से सामाजिक और वर्गीय दूरी को रेखांकित किया गया है। कवि का व्यंग्य किसी कृत्रिम भाषिक चमत्कार पर आधारित नहीं है, बल्कि जीवन की सामान्य स्थितियों से पैदा होता है और इसी कारण अधिक प्रभावशाली बनता है।
अजय चंद्रवंशी की एक उल्लेखनीय विशेषता उनकी दृश्य को शब्दों में मूर्त कर देने की क्षमता है। उनके दृश्य-चित्रण को पढ़ते हुए दृश्य पाठक की आँखों के सामने साकार होने लगता है। पिता का कमरा कविता में कवि लिखता है—
“कमरे में एक टूटी कुर्सी है
जिसे उन्होंने कामचलाऊ बना लिया था,
एक कूलर, एक स्टूल,
छत पर एक पंखा,
एक बिजली बोर्ड, जिसमें पीली रोशनी का बल्ब,
जमीन में पलस्तर कई जगह उखड़ा-उखड़ा।”
कुछ ही पंक्तियों में कवि ने एक कमरे का ऐसा दृश्य उपस्थित कर दिया है, जिसमें पिता का जीवन, अभाव और सादगी एक साथ दिखाई देने लगती है। इसी तरह पहली बार मजदूरी के लिए आए किसान का दृश्य किसान मजदूर कविता में अत्यंत जीवंत हो उठता है—
“वह मजदूरों के ठीहे पर कुछ असहज-सा बैठा था,
जैसे मजदूरों के बीच मजदूर न हो।
पहनावा मजदूरों के ढंग का न था,
धोती-कमीज पहने, सिर पर पागा बाँधे
वह किसान लग रहा था।”
हस्तरेखा बाँचने वाला कविता में भी दृश्य-चित्रण की यही क्षमता दिखाई देती है—
“उस उम्रदराज बुजुर्ग के पैर काँपते हैं,
ठीक से चला नहीं जाता।
उम्र की मार के आगे शरीर बेबस है,
फिर भी बैठता है फुटपाथ पर,
एक बोरी बिछाए,
जिस पर होती हैं एक-दो धार्मिक तस्वीरें
और धुआँ छोड़ती कुछ अगरबत्तियाँ जलती रहती हैं।”
इन पंक्तियों में केवल एक व्यक्ति का चित्र नहीं है, बल्कि उसके जीवन-संघर्ष का पूरा परिवेश उपस्थित हो जाता है। कवि की दृश्यात्मकता कविता को पाठकीय अनुभव के स्तर पर और अधिक सजीव बनाती है।
कविता में कथ्य जितना महत्वपूर्ण है, शिल्प का भी अपना महत्व है। लेकिन जब अलंकारों का प्रयोग सायास किया जाता है तो कविता की स्वाभाविकता प्रभावित हो सकती है। अजय चंद्रवंशी की कविताओं में अलंकारों का प्रयोग प्रायः सहज और स्वाभाविक रूप में हुआ है। प्रेम-कविताओं में उपमा का सुंदर प्रयोग दिखाई देता है—
“कितनी सुंदर लग रही थी आज तुम!
कितनी सादगी थी चेहरे पर
जैसे किसी नदी में होती है धरा से निकलते वक्त,
जैसे किसी मासूम बच्चे के चेहरे पर होती है
हँसते वक्त।”
साहिर लुधियानवी के लिए कविता में भी उपमा के माध्यम से प्रभाव को तीव्रता प्रदान की गई है—
“जैसे कोई खंजर सीने में उतर गया हो,
जैसे कोई बुझता शोला भड़क गया हो,
जैसे पिंजरे में कैद परिंदा लोहे से बगावत कर दे,
वही असर
तेरे गीतों, तेरी नज़्मों, तेरे शेरों ने मुझ पर किया है।”
इसी तरह तुम कविता में प्रयुक्त उपमान अत्यंत सहज और सुंदर हैं—
“तुम
जैसे बच्चों की मुस्कान,
जैसे सुबह-सुबह चिड़ियों की गान,
जैसे दूर मंदिर में घंटियों की सदा,
जैसे किसी मस्जिद की अजान।”
किसी कवि की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह अपनी संवेदनाओं के माध्यम से पाठक से कितना जुड़ पाता है। कवि और पाठक की संवेदनाओं का एकाकार हो जाना ही कवि-कर्म की सार्थकता है। चेतस रचनाकार वही है जिसमें अपने समय और समाज का बोध हो। अजय चंद्रवंशी की कविताओं में यह युगबोध स्पष्ट दिखाई देता है। समकालीन जीवन की विसंगतियाँ, सामाजिक असमानता, आर्थिक अभाव, श्रमिक जीवन, आदिवासी अस्मिता, राजनीतिक विडंबनाएँ, धार्मिक पाखंड, व्यवस्था की विसंगतियाँ और मनुष्य के भीतर बची हुई उम्मीद—इन सभी को कवि ने अपनी कविता में स्थान दिया है। कवि अपने संग्रह की अपनी बात में लिखते हैं, “कई संवेदनात्मक घटनाएँ, अनुभूति, मान-अपमान जब कभी मेरी संवेदनाओं को छूती है, झकझोरती है तो कोई पंक्ति जेहन में उभर आती है।” यही कथन उनकी रचना-प्रक्रिया को समझने की कुंजी भी है। सच्चा कवि पलायनवादी नहीं होता। वह अपने समय, समाज और आसपास की दुनिया को देखता है, महसूस करता है और फिर उसे शब्द देता है। अजय चंद्रवंशी ने भी यही किया है।
जिंदगी आबाद रहेगी केवल कविताओं का संग्रह नहीं, बल्कि हमारे आसपास बिखरी हुई जिंदगी, उसके संघर्ष, उसकी विडंबनाओं और उसकी उम्मीदों का दस्तावेज है। इन कविताओं में साधारण जन का जीवन असाधारण संवेदना के साथ उपस्थित हुआ है। कवि की भाषा सहज है, कथ्य सीधा है, दृष्टि यथार्थवादी है और स्वर कहीं करुण तो कहीं आक्रोशपूर्ण। उनकी कविताएँ पाठक को केवल भावुक नहीं करतीं, बल्कि उसे अपने समय और समाज के प्रश्नों पर विचार करने के लिए भी प्रेरित करती हैं। इस संग्रह की सबसे बड़ी शक्ति उसकी सादगी, यथार्थबोध, जनपक्षधरता और प्रतिरोध की चेतना है। अजय चंद्रवंशी की कविताएँ इस विश्वास को मजबूत करती हैं कि कविता तब अधिक प्रभावशाली होती है जब वह जीवन से जुड़ी होती है और आम आदमी की आवाज बनती है। इस दृष्टि से जिंदगी आबाद रहेगी समकालीन हिंदी कविता में अपनी विशिष्ट जनपक्षधर पहचान बनाने की क्षमता रखने वाला संग्रह है और इसकी कविताएँ सहृदय पाठकों को प्रभावित करने के साथ-साथ उन्हें अपने समय की सच्चाइयों से रूबरू कराने में भी सफल होती हैं।
नरेंद्र कुमार कुलमित्र
सहायक प्राध्यापक, हिंदी
आचार्य पंथ श्री गृंध मुनि नाम साहेब शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कवर्धा
जिला कबीरधाम, छत्तीसगढ़
वार्ड क्रमांक 08, मार्ग क्रमांक 3,
जी. श्याम नगर, कवर्धा,
जिला कबीरधाम, छत्तीसगढ़–491995
मो. : 9755853479