Wednesday, 19 August 2026

छत्तीसगढ़ी संस्कृति से सुवासित रचना : ‘बगरय छंद अंजोर’ 08.09.23

छत्तीसगढ़ी संस्कृति से सुवासित रचना : ‘बगरय छंद अंजोर’

‘बगरय छंद अंजोर’ छत्तीसगढ़ी जनभाषा के उदीयमान कवि सुखदेव सिंह अहिलेश्वर का सद्यः प्रकाशित छत्तीसगढ़ी काव्य-संग्रह है। इस संग्रह की सभी रचनाएँ छंदबद्ध हैं। काव्य-संग्रह में कुल 77 छंदबद्ध रचनाएँ हैं और पूरे संग्रह में 48 प्रकार के छंदों का प्रयोग हुआ है। छंदों की इतनी विविधतापूर्ण उपस्थिति यह प्रमाणित करती है कि कवि को छंदों से न केवल गहरा लगाव है, बल्कि उन्हें छंद-विधान का विशेष ज्ञान भी है। छंदबद्ध रचना करना जितना श्रमसाध्य होता है, उससे कहीं अधिक कठिन होता है छंदबद्ध इकाई में भावों और अर्थों को सुरक्षित रखते हुए अपनी बात को प्रभावी ढंग से कह पाना। निश्चित शब्द और मात्रा के अनुशासन में बँधकर अपनी पूरी बात कह देना कठोर साधना का ही प्रतिफल कहा जा सकता है। इस दृष्टि से ‘बगरय छंद अंजोर’ का महत्व और बढ़ जाता है।
हिंदी साहित्य में छंदबद्ध रचना का इतिहास अत्यंत पुराना है। हिंदी साहित्य के प्रारंभिक तीनों कालों—आदिकाल, भक्तिकाल और रीतिकाल—में मुख्यतः छंदबद्ध रचनाएँ ही हुईं। चंदबरदाई की कृति ‘पृथ्वीराज रासो’ में छंदों की इतनी विविधता दिखाई देती है कि उस ग्रंथ को छंदों का ‘अजायबघर’ कहा गया है। आधुनिक काल में भी भारतेंदु तथा द्विवेदी युग के शीर्षस्थ रचनाकारों ने हिंदी कविता में संस्कृत और हिंदी के विविध छंदों का प्रयोग किया। तोमर, पद्धरी, चौपाई, दोहा, रोला, सोरठा, उल्लाला, गीतिका, सरसी, हरिगीतिका, तांटक, वीर या आल्हा, भुजंगी, शालिनी, इंद्रवज्रा, वंशस्थ, भुजंगप्रयात, द्रुतविलंबित, तोटक, वसंततिलका, मालिनी, मंदाक्रांता, शार्दूलविक्रीडित, सवैया, रूप घनाक्षरी, कवित्त, कुंडलिया, बरवै, छप्पय, पुष्पिताग्रा, लावणी और त्रिभंगी आदि इसके प्रमुख उदाहरण हैं। छंद की इस समृद्ध परंपरा में ‘बगरय छंद अंजोर’ अपनी छंद-विविधता के कारण एक उल्लेखनीय कृति के रूप में सामने आती है।
छत्तीसगढ़ी साहित्य का प्रारंभ गाथा युग, लगभग 1000 ई. से माना जाता है। तब से लेकर आज तक छत्तीसगढ़ी साहित्य की पद्य और गद्य दोनों विधाएँ निरंतर समृद्ध होती रही हैं। छत्तीसगढ़ी साहित्य को वस्तुतः छत्तीसगढ़ी लोकसंस्कृति का आख्यान कहा जा सकता है। इसमें लोक की पीड़ा, उसके सुख-दुख, संघर्ष, उल्लास और जीवनानुभवों को सहज रूप में अनुभूत किया जा सकता है। गाथा युग से जन्मा छत्तीसगढ़ी साहित्य का छोटा-सा पौधा आज विशाल वटवृक्ष का रूप ले चुका है। छत्तीसगढ़ के लोक साहित्यकार समकालीन जीवन के विविध विषयों पर अपनी लेखनी चला रहे हैं। प्रेम-चित्रण की एकांगिकता से आगे बढ़कर विषयों की विविधता अब छत्तीसगढ़ी साहित्य की विशेषता बनती जा रही है। भाषाई लालित्य, सहजता और आत्मीयता के कारण छत्तीसगढ़ी साहित्य जनमन के बेहद करीब है। विशेष रूप से छत्तीसगढ़ी गीत और कविता अपनी गेयता एवं मधुरता के कारण सर्वाधिक लोकप्रिय हैं। ‘बगरय छंद अंजोर’ इसी समृद्ध लोकधर्मी परंपरा को आगे बढ़ाने वाली कृति है।
प्राचीन काल से ही अनेक रचनाकारों में अपनी रचना के प्रारंभ में ईश्वर या गुरु-वंदना करने की परंपरा रही है। ईश्वर या गुरु-वंदना के साथ रचनाकर्म प्रारंभ करने के पीछे अपने रचनाकर्म को निर्बाध बनाए रखने की कामना के साथ-साथ अपने इष्टदेव या गुरु के प्रति प्रेम, श्रद्धा और कृतज्ञता का भाव भी निहित रहता है। आलोच्य कृति ‘बगरय छंद अंजोर’ की पहली रचना ‘सुन के गुन’ (दोहा भजन) में रचनाकार के जीवन और रचनाकर्म का मार्ग प्रशस्त करने वाले गुरुओं तथा महापुरुषों के प्रति कृतज्ञता और प्रेरणा का भाव दिखाई देता है। कवि नानक, तुलसीदास, कबीर, रहीम, रसखान और घासीदास जैसे महापुरुषों को स्मरण करते हैं, वहीं छत्तीसगढ़ के विभूति रचनाकार कोदूराम ‘दलित’, सुंदरलाल शर्मा, श्यामलाल, भानु, विप्र, सुखलाल, कपिलनाथ, नरसिंह और मनोहर दास आदि के प्रति भी श्रद्धावनत दिखाई देते हैं—“पढ़ कवि कोदूराम ला/ पढ़ ले सुंदरलाल/ श्यामलाल के संग पढ़/ भानु विप्र शुकलाल।” इस आरंभ से ही कवि की साहित्यिक संस्कारभूमि और अपनी परंपरा के प्रति सम्मान का परिचय मिलता है।
‘बगरय छंद अंजोर’ में भावगत एवं शिल्पगत दोनों प्रकार की विविधता दिखाई देती है। कवि ने अपने समाज और परिवेश से जुड़े उन तमाम विषयों को अपनी रचनाओं में समाहित किया है, जो उनके अनुभव क्षेत्र में आए हैं। उनकी कविताओं में देशप्रेम, प्रकृति-चित्रण, छत्तीसगढ़ी संस्कृति का चित्रण, सामाजिक समस्याओं का विवेचन, मजदूर-किसान के जीवन की विसंगतियों का चित्रण तथा विभूतियों के प्रति आदरभाव प्रमुखता से दिखाई देता है। संवेदनशील रचनाकार अपनी रचना में केवल भोगे हुए यथार्थ का चित्रण नहीं करता, बल्कि अपनी दूरदर्शी सोच से बेहतर संभावनाओं को भी व्यक्त करता है। सामान्य परिस्थितियों में नीतिपरक संदेशों की पुनरावृत्ति उबाऊ लग सकती है, लेकिन जब सामाजिक समस्याओं की पुनरावृत्ति हो रही हो तो सुधारात्मक संदेशों की पुनरावृत्ति भी आवश्यक हो जाती है। कबीर, रहीम और वृंद के नीतिपरक दोहे इसी कारण हर युग में प्रासंगिक बने रहे हैं। इस कृति में भी अनेक ऐसी पंक्तियाँ हैं, जिनमें व्यवहारिक ज्ञान और सामाजिक संदेश निहित हैं—“जे घर अंगना मा रथे/ अंवरा तुलसी लीम/ जादातर आवय नहीं/ ओ घर बइद हकीम।” इसी तरह शराब की सामाजिक बुराई पर कवि कहते हैं—“टठिया लोटा बेच के/ पीयत दारु मंद/ ते मनखे के जान ले/ दिन बांचे हे चंद।” इन पंक्तियों में लोकानुभव से उपजा जीवन-बोध और सामाजिक सरोकार दोनों दिखाई देते हैं।
इस कृति में हिंदी साहित्य के भक्तिकाल की अनेक विशेषताओं को भी देखा जा सकता है। ईश्वर के प्रति आस्तिकता और श्रद्धाभाव, गुरु की महत्ता, मानवता की भावना, सामाजिक एवं धार्मिक विसंगतियों का चित्रण, समाज-सुधार की भावना तथा नैतिक संदेश जैसी विशेषताएँ संग्रह के अनेक छंदों में मिलती हैं। भक्तिकाल में जिस प्रकार धार्मिक उन्माद और अंधविश्वास समाज में व्याप्त था, उसकी अनेक विकृत छवियाँ आज भी हमारे आसपास दिखाई देती हैं। चिंता की बात यह है कि ये परिस्थितियाँ थमने के बजाय अनेक स्तरों पर बढ़ती और फैलती दिखाई दे रही हैं। जाति और धर्म के आधार पर समाज को विभाजित करने वालों के प्रति कवि क्षुब्ध दिखाई देते हैं। वे सभ्य समाज के लिए मानवतावादी धर्म को आवश्यक मानते हैं—“जात धरम के झन दे ताना/ मनखे मनखे एक समाना/ काबर सिरजित हे जग जानौ/ मानवता का हे पहिचानौ।” व्यवहार-बोध और जीवन-संदेश की ऐसी ही अभिव्यक्तियाँ ‘नामबर’, ‘जिनगी मिले उधार’, ‘मतदान’, ‘आदत अपन बनाई’, ‘जीयत भर सुख पाबे’, ‘सुग्घर रीत निभाव’ और ‘सहीं टेम मा गोड़ घांटी बंधावै’ आदि रचनाओं में भी दिखाई देती हैं।
रचनाकार को अपने प्रदेश और अपनी धरती के प्रति अटूट लगाव है। छत्तीसगढ़वासी छत्तीसगढ़ को ‘महतारी’ अर्थात् माँ का दर्जा देते हैं। कवि ‘छत्तीसगढ़ महिमा’ कविता में छत्तीसगढ़ का वात्सल्यमयी माँ के रूप में चित्रण करते हुए उसकी महिमा का गुणगान करते हैं। इस कविता में छत्तीसगढ़ से संबंधित पौराणिक कथाओं, नदियों, भौतिक संसाधनों, लोकगीतों, लोकनृत्यों, तीज-त्योहारों और ऐतिहासिक स्थलों का सुंदर चित्रण मिलता है—“राजा दशरथ के ससुरारे/ कौशल्या के मइकारो/ दक्षिण कौशल नाव पुराना/ रामलाल के महिमा यारो/ सुवा ददरिया करमा पंथी/ श्रोतन के अंतस पोहै/ राउत नाचा के दोहा हा/ काखर मन ला नइ मोहै।” इन पंक्तियों में छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक स्मृतियों, लोकविश्वासों और लोककलाओं के प्रति कवि की आत्मीयता सहज रूप में व्यक्त हुई है।
जाति-पाँति और ऊँच-नीच के भेदभाव से परे समतावादी समाज की स्थापना में संत गुरु घासीदास जी का प्रयास अन्यतम है। वे संत कबीरदास की तरह ऊँचे कुल को महत्व देने के बजाय ऊँचे कर्म को महत्व देते हैं। उत्तम चरित्र और मानवता के गुणों से विभूषित मनुष्य को ही वे श्रेष्ठ मानते हैं। गुरु घासीदास जी के संदेशों से प्रेरित कवि श्रद्धावनत होकर उनकी महिमा का बखान करते हैं। ‘सतगुरु बाबा मोर’ के अतिरिक्त अन्य छंदों में भी गुरु घासीदास जी के प्रति श्रद्धाभाव प्रकट हुआ है। यहाँ गुरु घासीदास केवल धार्मिक व्यक्तित्व के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक समता और मानवतावादी चेतना के प्रतीक के रूप में उपस्थित होते हैं।
कवि की दृष्टि समकालीन राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों पर भी है। आज लोकतंत्र के भीड़तंत्र में बदलते जाने की चिंता व्यापक है। सत्ता प्राप्त करने के लिए धनबल और बाहुबल का प्रभाव बढ़ना लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए चिंता का विषय है। ऐसी परिस्थितियों में ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ जैसी मानसिकता मजबूत होती जाती है। लोकतंत्र के भीड़तंत्र में बदलने की पीड़ा कवि की काव्य-पंक्तियों में स्पष्ट दिखाई देती है। झूठ, फरेब और पाखंड से भरे लोगों के बीच सीधे-सादे व्यक्ति की विवशता को कवि इस प्रकार व्यक्त करते हैं—“अब्बड़ ही डंडी/ घात घमंडी/ अनचित कारज/ रोज करै/ चापट चपकाके/ धोखा खाके/ सिधवा मनखे रोज मरै।” इन पंक्तियों में छल-कपट से भरे सामाजिक परिवेश में सरल और ईमानदार व्यक्ति की पीड़ा प्रभावी ढंग से व्यक्त हुई है।
‘बगरय छंद अंजोर’ कवि का पहला काव्य-संग्रह है। इसकी कहन-शैली में लक्षणा और व्यंजना की अपेक्षा अभिधा की प्रधानता दिखाई देती है। भावों का संप्रेषण प्रायः सीधे और स्पष्ट रूप में हुआ है। निश्चित रूप से कविता के लिए संवेदना पहली शर्त है, किंतु संवेदना को व्यक्त करने के लिए व्यंजनात्मक शैली कविता की मार्मिकता और प्रभावशीलता को और बढ़ा सकती है। कहन की शैली में पैनापन निरंतर अध्ययन, अनुभव और रचनात्मक परिपक्वता से आता है। यह भी सच है कि प्रत्येक रचनाकार की रचनात्मक यात्रा अभिधा से ही आगे बढ़ती है। जब शैली परिष्कृत होती है, तब तथात्मक बातें भी अधिक प्रभावशाली और बहुआयामी होने लगती हैं। इस दृष्टि से यह संग्रह कवि की रचनात्मक यात्रा का महत्वपूर्ण प्रारंभिक पड़ाव है और आगे की संभावनाओं के संकेत भी देता है।
कुल मिलाकर ‘बगरय छंद अंजोर’ केवल छंदों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ी लोकजीवन, संस्कृति, परंपरा, सामाजिक चेतना और मानवीय सरोकारों से जुड़ी काव्यात्मक अभिव्यक्ति है। 77 रचनाओं और 48 प्रकार के छंदों के माध्यम से कवि ने छंद परंपरा के प्रति अपनी गहरी प्रतिबद्धता व्यक्त की है। साथ ही उन्होंने छत्तीसगढ़ी समाज के सुख-दुख, उसकी समस्याओं, सांस्कृतिक विरासत, लोकविश्वासों और समकालीन चुनौतियों को अपनी कविता का विषय बनाया है। यह संग्रह छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य के संरक्षण तथा छत्तीसगढ़ी संस्कृति के संवर्धन की दिशा में एक सार्थक प्रयास कहा जा सकता है। छत्तीसगढ़िया संस्कृति की सुगंध से सुवासित, लोकजीवन की मिट्टी से जुड़ी और छंदों के अनुशासन में ढली यह कृति निश्चय ही छत्तीसगढ़ के जनमानस को प्रभावित और प्रेरित करेगी—ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए।

कृति — बगरय छंद अंजोर (छत्तीसगढ़ी कविता संग्रह)
कवि — सुखदेव सिंह अहिलेश्वर
प्रकाशक — छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग

समीक्षक -- नरेंद्र कुमार कुलमित्र
कवर्धा, छत्तीसगढ़

नफरत और प्रेम 07.09.23

नफ़रत
रात के सघन अंधेरे की तरह होती है,
जिसके होने से कुछ भी देखा नहीं जा सकता!

​प्रेम
दिन के उजाले की तरह होता है,
जिसके होने से सब कुछ आर-पार देखा जा सकता है!!

​– नरेंद्र कुमार कुलमित्र

चीटियों की वापसी : कटु यथार्थ का आईना 13.07.23

चीटियों की वापसी : कटु यथार्थ का आईना
युवा उपन्यासकार किशन लाल का उपन्यास ‘चीटियों की वापसी’ एक वर्ष पूर्व पढ़ा था। पढ़ते समय उपन्यास से जुड़े कुछ विचार और टिप्पणियाँ मैंने अलग-अलग नोट्स के रूप में दर्ज की थीं। उन बिखरी हुई टिप्पणियों को अब एक क्रम में रखने की कोशिश कर रहा हूँ।
‘चीटियों की वापसी’—यानी यह शहर रहने लायक नहीं! शीर्षक के साथ सामने आने वाला यह उपन्यास वस्तुतः छत्तीसगढ़ का एक ऐसा आईना है, जिसमें पाठक प्रदेश की अनेक मूलभूत समस्याओं, सामाजिक अंतर्विरोधों और जीवन की विडंबनाओं को साफ-साफ देख सकता है। उपन्यास में शहरी जीवन की विसंगतियाँ, विकृतियाँ और आडंबर जिस तरह उभरकर सामने आते हैं, वे पाठक को सहज ही अपने आसपास की दुनिया से जोड़ देते हैं।
उपन्यास के केंद्र में तीन चीटियाँ हैं। मानवीय पात्रों में गुरुजी, संजय, मधुलिका, अंबा, सुनील, संतन दास, सुखचैन, भागवत दास, ज्ञानदास, गौरी और दूरपति आदि प्रमुख हैं। किशन लाल का यह उपन्यास मुख्यतः दलित चिंतन पर केंद्रित दिखाई देता है, लेकिन इसके समानांतर छत्तीसगढ़ की अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय समस्याएँ तथा चिंताएँ भी अंतर्निहित हैं। दलित विमर्श के साथ स्त्री विमर्श, पर्यावरण विमर्श, आदिवासी विमर्श, सामाजिक विमर्श और धार्मिक विमर्श भी उपन्यास की कथा में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं।
इस उपन्यास की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि कथा और उसकी चिंताएँ मूलतः मानवीय दुनिया से संबंधित हैं, लेकिन कथा का निर्वाह चीटियों को पात्र बनाकर किया गया है। पशु-पक्षियों और जीव-जंतुओं के माध्यम से मानवीय समाज की कथा कहने की यह परंपरा भारतीय साहित्य में पुरानी है। जातक कथाओं, हितोपदेश और आचार्य विष्णु शर्मा की पंचतंत्र की कथाओं में इसके उदाहरण मिलते हैं। किशन लाल इसी परंपरा को समकालीन सामाजिक यथार्थ के साथ जोड़ते हैं। कथा भले ही चीटियों और दूसरे जीव-जंतुओं के बीच चलती हो, लेकिन उनके संवादों में मनुष्य की दुनिया का कटु यथार्थ पूरी तीव्रता के साथ उजागर होता है।
उपन्यास की कथा का आरंभ छत्तीसगढ़ राज्य के निर्माण और रायपुर को राजधानी बनाए जाने के प्रसंग से होता है। राजधानी के विकास और विस्तार के लिए रायपुर के आसपास के अनेक गाँवों के विस्थापन की पीड़ा को उपन्यासकार ने अपनी कथा का आधार बनाया है। विकास की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि उसका लाभ प्रायः शक्तिशाली और संपन्न वर्ग को मिलता है, जबकि उसकी कीमत मध्यवर्ग, निम्नवर्ग और प्रकृति को चुकानी पड़ती है। विस्थापन का दर्द धनिक वर्ग तक बहुत कम पहुँचता है; उसका वास्तविक भार उन लोगों को उठाना पड़ता है जिनकी जमीन, घर और जीवन ही उनके अस्तित्व का आधार हैं।
विकास के नाम पर होने वाला विस्थापन केवल मनुष्य की दुनिया को ही प्रभावित नहीं करता, बल्कि पशु-पक्षियों, जीव-जंतुओं और कीड़े-मकोड़ों की बसी-बसाई दुनिया भी उजड़ जाती है। मनुष्य किसी तरह विस्थापित होकर पुनर्वासित हो सकता है और धीरे-धीरे नए परिवेश के अनुकूल हो सकता है, लेकिन निरीह जीव-जंतुओं के लिए उनका उजड़ना एक पूरी दुनिया के समाप्त हो जाने जैसा है। उपन्यास में खेतों में रहने वाली चीटियों का विस्थापित होकर शहर में पहुँचना इसी विडंबना का मार्मिक रूपक बन जाता है।
गाँव की स्वच्छ, सुंदर और अपेक्षाकृत प्रदूषण रहित आबोहवा में रहने वाली चीटियाँ जब शहर पहुँचती हैं तो उन्हें बदबू, प्रदूषण और कृत्रिम जीवन से दो-चार होना पड़ता है। चीटियों के संवादों के माध्यम से ग्रामीण और शहरी पर्यावरण की तुलना की गई है। इस तुलना में केवल दो भौगोलिक परिवेशों का अंतर नहीं है, बल्कि आधुनिक विकास मॉडल पर भी गंभीर प्रश्न खड़े किए गए हैं। चीटियों की बातचीत धीरे-धीरे मानव समाज की पोल खोलती जाती है और पाठक को यह सोचने के लिए विवश करती है कि विकास आखिर किसके लिए और किस कीमत पर हो रहा है।
उपन्यास में दलितों की समस्याओं, विशेषकर छत्तीसगढ़ के सतनामी समुदाय के सामाजिक जीवन, उसकी अच्छाइयों और अंतर्विरोधों को भी सामने लाया गया है। संजय, गुरुजी और सुखचैन के बीच होने वाली बहसों में संविधान की वास्तविकता, आदिवासियों की समस्याएँ, नक्सली समस्या और उनके पीछे की जमीनी परिस्थितियों पर गंभीर विचार दिखाई देता है। यहाँ उपन्यासकार किसी सतही निष्कर्ष पर पहुँचने के बजाय उन जटिल परिस्थितियों की ओर संकेत करता है, जिनसे समाज लगातार जूझ रहा है।
गुरुजी और पत्रकार संजय के संवादों में सरकारों के कथित धर्मनिरपेक्ष और संवैधानिक चरित्र तथा उनके व्यवहार के बीच दिखाई देने वाले अंतर पर भी प्रश्न उठता है। राजिम मेले को कुंभ का दर्जा दिए जाने और उसके लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जाने की तुलना में सतनामियों के प्रमुख तीर्थस्थल गिरौधपुरी के विकास की उपेक्षा का प्रसंग धार्मिक और राजनीतिक प्राथमिकताओं पर सवाल खड़ा करता है। यह प्रसंग इस बात की ओर संकेत करता है कि लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था में भी यदि किसी समुदाय के साथ असमान व्यवहार दिखाई दे, तो उस पर प्रश्न उठाना आवश्यक है।
उपन्यास की भाषा उसकी कथा और पात्रों के अनुरूप है। प्रसंगानुकूल भाषा इसका एक महत्वपूर्ण गुण है। जहाँ पात्रों के भीतर गुस्सा, खीझ, आक्रोश या असहमति है, वहाँ ठेठ छत्तीसगढ़ी और प्रचलित बोलचाल के शब्दों तथा गालियों का प्रयोग भी स्वाभाविक ढंग से हुआ है। वहीं जब चीटियाँ गाँव की आबोहवा, प्रकृति और उसकी खूबसूरती का वर्णन करती हैं, तो भाषा अत्यंत कोमल और कहीं-कहीं काव्यात्मक हो जाती है। भाषा का यह उतार-चढ़ाव उपन्यास के वातावरण को जीवंत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
उपन्यास में चीटियाँ सर्वहारा वर्ग का प्रतिनिधित्व करती हैं। उनके भीतर किसान, मजदूर, दलित और तमाम शोषित वर्गों की सामूहिक छवि देखी जा सकती है। इस वर्ग के पास पर्याप्त धन और भौतिक संसाधन भले ही न हों, लेकिन सामुदायिक एकता, पारस्परिक प्रेम, भाईचारा और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की क्षमता प्रबल है। चीटियाँ छोटी हैं, कमजोर दिखाई देती हैं, लेकिन उनकी सामूहिक शक्ति अपार है। यही सामूहिकता उन्हें सत्ता की जड़ों को हिला देने की क्षमता प्रदान करती है। इस अर्थ में चीटियाँ केवल उपन्यास के पात्र नहीं रह जातीं, बल्कि वे एक बड़े सामाजिक रूपक में बदल जाती हैं।
उपन्यास में आद्यंत छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक और सामाजिक झलक दिखाई देती है। यहाँ छत्तीसगढ़ी जनजीवन के प्रति आत्मीयता भी है और उसकी विसंगतियों पर तंज भी। प्रदेश के लोगों और व्यवस्था के संचालकों की कमियों को लेखक ने बिना किसी लाग-लपेट के कथा के विभिन्न प्रसंगों में उजागर किया है। छत्तीसगढ़ में शराब की लत के कारण परिवारों के उजड़ने की समस्या को दूरपति के पति शिव और सुशीला के पति रामदास जैसे पात्रों के माध्यम से प्रभावशाली ढंग से सामने लाया गया है।
इस उपन्यास का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि लेखक जातिवाद और संप्रदायवाद से मुक्त ऐसे समाज की कल्पना करता दिखाई देता है, जिसमें समानता, सामूहिकता और सामाजिक न्याय को केंद्रीय स्थान प्राप्त हो। चीटियों का समुदाय इसी सामूहिक और समतामूलक समाज का एक रूपक बनकर सामने आता है। उनके जीवन में व्यक्तिगत स्वार्थ से अधिक सामुदायिक हित महत्वपूर्ण है। इस दृष्टि से उपन्यासकार की वैचारिक आकांक्षा स्पष्ट दिखाई देती है।
‘चीटियों की वापसी’ थोथे आदर्शों के बरक्स कटु यथार्थ का उपन्यास है। यह पाठक को किसी काल्पनिक और आदर्श दुनिया में ले जाने के बजाय उसके अपने आसपास की दुनिया से सामना कराता है। विकास, विस्थापन, जाति, धर्म, पर्यावरण, आदिवासी जीवन, दलित प्रश्न, स्त्री की स्थिति, शराब जैसी सामाजिक बुराइयाँ और सत्ता-व्यवस्था के अंतर्विरोध—इन सबको उपन्यास अपनी कथा में समेटता है।
किशन लाल की सफलता इस बात में है कि उन्होंने गंभीर सामाजिक प्रश्नों को सीधे उपदेश के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय चीटियों की दुनिया के माध्यम से मनुष्य की दुनिया को देखने का अवसर दिया है। चीटियाँ लौटती हैं, लेकिन उनके साथ केवल एक कथा नहीं लौटती; लौटता है वह सवाल कि क्या हमारा विकास सचमुच हमें रहने योग्य दुनिया दे रहा है?
यही प्रश्न इस उपन्यास को समकालीन छत्तीसगढ़ के सामाजिक यथार्थ का एक महत्वपूर्ण आख्यान बनाता है। ‘चीटियों की वापसी’ पढ़ते हुए पाठक अंततः चीटियों की नहीं, बल्कि अपने समाज और अपने समय की वापसी की प्रतीक्षा करता हुआ दिखाई देता है।

— नरेंद्र कुमार कुलमित्र

मुसीबतें 06.07.23

मुसीबतें
अचानक आ धमकती हैं
बाढ़ की तरह हरहराकर बहा लेना चाहती हैं
संभलने का ज़रा भी मौका नहीं देतीं
हम अकबका जाते हैं
हमारे विवेक की बत्ती गुल हो जाती है
मगर बाहों को कसकर
सांसों को थामकर
पांवों को जमाकर
धैर्य बांधकर
थोड़ी देर अडिग खड़े रहने से
मुसीबतें हमसे दूर चली जाती हैं...

उदास क्षणों में 04.07.23

उदास होता हूँ
तो सोचता हूँ कि उदासी कब जाएगी?
​पर हर बार उदासी से उबरने के बाद ही
समझ पाता हूँ उदासी का महत्त्व।
​उदास क्षणों में ही
लगातार पनपते हैं
तरह-तरह के नए विचार।
​सच है, उदासी में ही विचार पकते हैं,
खरे बनते हैं।
​उमंग के क्षणों में विचार आते ही नहीं,
आते भी हैं, तो बहुत बौने होते हैं।
​बौने विचारों से व्यक्तित्व भी बौना हो जाता है,
व्यक्ति को विचारवान बनाती है उदासी...
​मैं आभारी हूँ अपने तमाम उदास क्षणों का,
जिन्होंने मुझे कसा है, पकाया है, बनाया है।
​उदासी के बाद
बिल्कुल नया हो जाता है व्यक्तित्व।
​हालाँकि मैं कभी उदास नहीं होना चाहता,
पर उदास होने पर
अपनी उदासी को कभी कोसता भी नहीं...!!

तुम रह जाना मेरे भीतर 01.07.23

तुम रह जाना मेरे भीतर—
जैसे अनगिनत शब्दों के कहे जाने पर भी
अव्यक्त रह जाती हैं बहुत-सी बातें।

​तुम रह जाना मेरे भीतर—
जैसे किसी के सशरीर चले जाने के बाद भी
मानस-पटल पर अंकित रह जाती है उसकी आकृति।

​तुम रह जाना मेरे भीतर—
जैसे असहनीय दर्द का पल गुज़र जाने पर भी
ज़ेहन में बची रह जाती है एक हल्की-सी टीस।

​तुम रह जाना मेरे भीतर—
जैसे समय के बीत जाने के बाद भी
हृदय में बनी रह जाती है अतीत की छाप।

​तुम रह जाना मेरे भीतर—
जैसे सब कुछ भूल जाने के बाद भी
स्मृतियों में शेष रह जाते हैं कुछ धुंधले से पन्ने।

​तुम रह जाना मेरे भीतर—
जैसे सारे काम निपटा लेने पर भी
अधूरे ही बचे रह जाते हैं कुछ काम।

​तुम रह जाना मेरे भीतर—
जैसे सब कुछ पा लेने के बाद भी
शेष रह जाती है कुछ और पा लेने की लालसा।

दरख़्त-सी ज़िंदगी 29.06.23

दरख़्त-सी है यह ज़िंदगी,
ख़्वाब इसके पत्ते हैं।
वक़्त के साथ पककर
पीले पड़ जाते हैं,
फिर शाख़ों से टूट जाते हैं...
​पर देखते ही देखते फिर,
बीते ख़्वाबों की तरह,
नई कोपलों से
लद जाते हैं दरख़्त।

Tuesday, 18 August 2026

गजल जरूरी है 20.06.23

​जो हो रहा है उसे देखना ज़रूरी है,

और देखे हुए को लिखना ज़रूरी है।

​खाली बैठे रहने से कुछ नहीं होगा,

ज़िंदगी में हुनर सीखना ज़रूरी है।

​पैसे खर्च कर लो जितना भी चाहे,

थोड़ा पानी बचाकर रखना ज़रूरी है।

​चाहे जितना उड़ लो आसमान पर,

फिर धरती की ओर देखना ज़रूरी है।

​प्रतिशोध में जुल्म तो ढाए ही जाएंगे,

फिर भी प्रतिरोध में लिखना ज़रूरी है।

ग़ज़ल सीख 20.06.23

ग़ज़ल

जैसे हो, वैसा रहना सीख,
दिल में है जो, उसे कहना सीख।

सुखों में तो सब जी लेते हैं,
दुखों को भी सहना सीख।

ताउम्र साथ नहीं देता कोई,
अकेले में भी रहना सीख।

ठीक नहीं है यूँ थम जाना,
नदी की तरह बहना सीख।

कहीं, कभी अनुचित लगे,
उसे दो टूक कहना सीख।

— नरेंद्र कुमार कुलमित्र

मोक्ष - 21.05.23

मोक्ष - 21.05.23

ऐसा मुझसे कभी नहीं होता
कि कोई मुझसे अप्रसन्न रहे और मैं खुश रहूँ।
किसी की अप्रसन्नता का कारण बनकर
बुरी तरह विचलित हो जाता हूँ।
मुझे बिल्कुल भी सामान्य नहीं रहने देता
मेरे मन में उपजा आत्मग्लानि का भाव।
खुद को धिक्कारता हूँ बार-बार,
कहता हूँ—क्षमा माँग लो;
पर रोड़े की तरह मेरा अहं
बीच रास्ते में खड़ा हो जाता है।
पर मेरे प्रेम की ऊष्मा से न पिघल सके,
इतना कठोर कभी नहीं रहा मेरा अहं।
अहं का टूटना...
फिर क्षमा माँगना...
और प्रेम में डूब जाना...
मोक्ष की प्राप्ति-सा लगता है।

-- नरेंद्र कुमार कुलमित्र
9755852479

तुम्हारे साथ सत्रह साल.. 06.0623

1. तुम्हारे साथ सत्रह साल.. 06.0623
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मैं टूटने लगता हूं 
तुम टूटने नहीं देती 
मैं बिखरने लगता हूं 
तुम बिखरने नहीं देती
लगता है तुम मुझे जोड़ने और संवारने ही आई हो
तुम लड़खड़ाती हो मैं..थाम लेता हूं
मैं लडखड़ाता हूं तुम संभाल लेती हो 
मेरे हिस्से का अंधेरा तुम ले लेती हो
अपने हिस्से का उजाला तुम दे देती हो
कभी तुम मुझे फटकारती हो 
कभी मैं तुम्हें फटकारता हूं
यूं एक दूसरे को फटकारने से झड़ जाती है 
हमारी जिंदगी में चिपकी हुई धूल
प्यार में हम झगड़ते हैं 
प्यार के लिए हम लड़ते हैं 
कभी निराश होकर डूब-डूब सा जाता हूं
तुम मेरी बांहें पकड़ ऊबार लेती हो
हमने साथ क्या खोया पता नहीं
पर पाया है हमने सब कुछ जो भी हमने सोचा...
तुम बस यूं संग-संग साथ चलते रहना
झगड़ना लड़ना मगर साथ रहना
हम यूं ही बढ़ेंगे आगे
नई कहानी गढ़ेंगे आगे...।

2.तुम्हें कैसे व्यक्त करूं...
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जिंदगी जो मैंने कभी परिभाषा में पढ़ी थी
तुमसे मिलने के बाद 
मैंने असल मायने में जिंदगी को जीना सिखा

कहते हैं प्रेम की गहराई में 
उथली औपचारिकताएं नहीं रह जाती
नहीं रह जाते मैं और तुम का भेद
देह और आत्मा की भाषा एकाकार हो जाती है

सुख दुख की बातें कर लेती हैं सचेतन इंद्रियां
सांसों से पता चल जाता है मन की बात
प्रेम अभिव्यक्ति के लिए निरर्थक लगते हैं सारे शब्द
प्रेम की उस गहराई में केवल अव्यक्त सचाई पलती है

तुम ही कहो प्रेम को शब्दों में कैसे कहूं
पता नहीं कितना व्यक्त कर पाऊंगा शब्दों से अपना प्रेम
फिर भी लिखता हूं तुम्हारे प्रेम में कविता
कहना चाहता हूं
पर कभी पूरी नहीं होती...
हमेशा अधूरी होती है प्रेम की कविता

--- नरेन्द्र कुमार कुलमित्र

वक्त 24.04.26

वक्त
बड़ा बेरहम होता है वक्त,
चाहो थोड़ा ठहर जाए,
तो ठहरता ही नहीं,
बड़ी जल्दी गुज़र जाता है...
और जब चाहो
जल्दी गुज़र जाए ये वक्त,
तो ठहर-सा जाता है बेरहम,
जाने क्यों गुज़रता ही नहीं...?
— नरेंद्र कुमार कुलमित्र

जन्मदिन की बधाई - 18.04.23 (लघुकथा)

जन्मदिन की बधाई - 18.04.23
(लघुकथा)
अड़सठ साल का सूरज अपनी उम्र के इस पड़ाव पर लगभग अकेला पड़ चुका था। जीवन भर साथ देने का वादा करने वाली उसकी अर्धांगिनी दो साल पहले ही इस दुनिया से विदा हो गई थी। आज सुबह-सुबह समाचार-पत्र पढ़ते हुए उसके मन में थोड़ी उदासी थी, तो थोड़ी प्रसन्नता भी। चार अक्टूबर की तारीख ने उसे अतीत की गलियों में पहुँचा दिया।
यादों में डूबा सूरज सोच रहा था कि पढ़ाई के दिनों में और फिर अपने अध्यापकीय जीवन में चार अक्टूबर का दिन आते ही वह कितना खुश हो जाया करता था। घर-परिवार के लोग, दोस्त-यार और सहकर्मी उसे गले लगाकर जन्मदिन की बधाई देते थे। रेस्टोरेंट में प्रेमिका मिलती, ‘आई लव यू’ कहती, प्यार से चूमती और कोई खूबसूरत-सा उपहार थमा देती। ‘हैप्पी बर्थडे’ लिखी सजावटी सामग्रियों और रंग-बिरंगे गुब्बारों से कमरा सजा दिया जाता। ‘हैप्पी बर्थडे’ गीत पर पत्नी और बच्चे मिलकर नाचते। दीपक जलाकर आरती उतारी जाती, माथे पर रोली लगाई जाती और बड़े उत्साह के साथ केक काटा जाता।
ऐसे मौकों पर दोस्त भी अपनी वाली पार्टी लेने से कहाँ चूकते थे! उन्हें तो नॉनवेज खाने के साथ व्हिस्की, रम या बीयर चाहिए होती थी। उन दिनों सबको उसका जन्मदिन याद रहता था। लेकिन आज... आज उसे जन्मदिन पर याद करने वाला कोई नहीं था।
उसे आज उस सच की साक्षात अनुभूति हो रही थी—उगते हुए सूरज को सब प्रणाम करते हैं, डूबते हुए सूरज को कोई नहीं।
रात के दस बज चुके थे। खिन्न मन से सूरज सोने की तैयारी कर ही रहा था कि तभी उसके मोबाइल की घंटी बजी। अनजान नंबर था। उसने फोन उठाया।
“हम एलआईसी से बोल रहे हैं, सूरज जी। आपको जन्मदिन की बहुत-बहुत बधाई!”
कुछ क्षणों के लिए सूरज जैसे स्तब्ध रह गया। फिर उसके उदास चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान खिल उठी।
शायद आज पहली बार उसे यह एहसास हुआ कि याद करने के लिए रिश्ते ही जरूरी नहीं होते, कभी-कभी एक अनजान आवाज भी अकेलेपन की दीवार में छोटी-सी खिड़की खोल देती है।

--नरेंद्र कुमार कुलमित्र
9755852479

निजता - 30.03.23

निजता - 30.03.23

हमें निजता नहीं खोनी चाहिए,
खोनी चाहिए हमें अपनी नीचता।
मगर जिसकी निजता में ही नीचता हो,
उसे अपनी निजता खो देनी चाहिए...

-- नरेंद्र कुमार कुलमित्र

‘नीलमणि’ : विज्ञान, अध्यात्म, प्रेम, प्रकृति और अंतर्द्वंद्व की कविताएँ 26.03.23

‘नीलमणि’ : विज्ञान, अध्यात्म, प्रेम, प्रकृति और अंतर्द्वंद्व की कविताएँ
‘नीलमणि’ नीरज मनजीत का तीसरा काव्य-संग्रह है। इससे पहले उनके दो काव्य-संग्रह—‘कविता खिलती है’ एवं ‘ग्लेशियर’—प्रकाशित हो चुके हैं। इस संग्रह में कुल 100 कविताएँ संकलित हैं, जिन्हें पाँच भागों में विभाजित किया गया है। पहला भाग ‘अध्यात्म और प्रेम’, दूसरा ‘विज्ञान और प्रेम’, तीसरा ‘प्रेम और प्रकृति’, चौथा ‘अंतर्द्वंद्व और कोविड काल में कविता’ तथा पाँचवाँ ‘कुछ और कविताएँ’ है। इन पाँचों भागों में क्रमशः 18, 17, 35, 18 और 12 कविताएँ संकलित हैं। संग्रह के तीसरे भाग ‘प्रेम और प्रकृति’ में सर्वाधिक 35 कविताएँ हैं।
कविता-संग्रह की अधिकांश कविताएँ प्रेम से आप्लावित हैं। संग्रह के प्रारंभिक तीन भागों के शीर्षकों में ‘प्रेम’ शब्द का प्रयोग हुआ है। सच भी है कि अध्यात्म, विज्ञान और प्रकृति प्रेम के बिना अधूरे हैं। तीनों की सार्थकता उनमें निहित प्रेम से ही है। प्रेम जीवन का अनिवार्य अंग है। बिना प्रेम के जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। अथवा यूँ कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी कि जीवन है तो प्रेम है और प्रेम है तो जीवन है।
इस काव्य-संग्रह की अधिकांश कविताएँ विज्ञान-प्रेरित हैं। कवि अध्यात्म, प्रेम, प्रकृति और हमारे भीतर चल रहे अंतर्द्वंद्व को विज्ञान से जोड़ते हैं। आज हमारा पूरा जीवन और पूरा परिवेश विज्ञानमय है। वैज्ञानिक शोधों और आविष्कारों का हमारे जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा है। ऐसे में वैज्ञानिक सोच रखने वाला दूरदृष्टा कवि भला विज्ञान से कैसे अछूता रह सकता है। इस संग्रह की अधिकांश कविताओं में वैज्ञानिक शब्दावलियों की भरमार दिखाई देती है। उनकी कविताओं में गैलेक्सी, ब्लैक होल, ब्रह्मांड, सूर्य, चंद्रमा, नक्षत्र, क्वांटम भौतिकी, आइंस्टाइन, सापेक्षता का सिद्धांत, स्ट्रिंग पार्टिकल, ग्रेविटेशनल पार्टिकल, हिग्स बोसोन, आकाशगंगा, अंतरिक्ष, डार्क मैटर, यूनिवर्स, प्लेनेट, गुरुत्वाकर्षण, कॉस्मिक सिविलाइजेशन, स्पेस, कॉस्मिक आवरण, तारामंडल, एलियन, ग्रह, निर्वात, प्रकाशवर्ष, इवोल्यूशन, निहारिका, सितारे, इवेंट होराइजन जैसे शब्दों का प्रयोग स्वाभाविक रूप से हुआ है। प्रकृति और अंतरिक्ष की दुनिया जितनी रहस्यों से भरी हुई है, उतना ही रहस्यमय प्रेम है और उतनी ही रहस्यमय मानवीय व्यवहार की दुनिया भी। कवि समस्त मानवीय व्यवहारों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखते हैं। हम कह सकते हैं कि उनकी कविताओं में गहरा विज्ञान है या फिर पूरा विज्ञान ही कविताओं में ढल गया है। इस संग्रह में ऐसी बहुत-सी कविताएँ हैं, जिनमें वैज्ञानिक परिकल्पना कवि-कल्पना में समाहित हो गई है। ‘किसी दिन’ कविता में ऐसे नए आयाम की परिकल्पना की गई है, जहाँ हमारी गति, हमारा दिमाग, यहाँ तक कि चौपायों की दुनिया भी आमूलचूल रूप से बदलकर एक नई और विस्तारित दुनिया का रूप ले लेगी।
15वीं-16वीं शताब्दी में अंधधार्मिकता का एक दौर था। एक बार फिर 21वीं सदी के इस दौर में हम उसी अंधधार्मिकता को अपनी आँखों से देख रहे हैं। जिस अंधधार्मिकता का विरोध कबीर ने किया था, बिल्कुल वैसे ही कर्मकांडों, धार्मिक उत्सवों एवं जुलूसों का दौर फिर शुरू हो गया है। पीड़ित-शोषित जनों की सेवा को नारायण-सेवा माना जाता है, मगर आज की अंधधार्मिकता ने नर-सेवा को दरकिनार कर दिया है। कवि की पहली कविता ‘क्षमा करना देव’ में ‘नर-सेवा ही नारायण-सेवा है’ का भाव प्रस्फुटित हुआ है—“.....रक्तरंजित उस युवक को/औषधालय तक ले जाने में ही/लगा रहा देव/आतंकियों ने जिसे/संगीनों से बींध दिया था/मुझे क्षमा करना/तुम्हारी जय करते/भक्तों के जुलूस के साथ/मैं तुम तक नहीं पहुँच सका......”
‘राग आशा’ शीर्षक की कविता जीवन में आशा का नया राग उत्पन्न करने वाली कविता है। दरअसल, इस दुनिया में अंधकार और निराशा जैसी कोई बात ही नहीं होती। उजाले का न होना अंधकार है और आशा का न होना ही निराशा है। कुदरती चीजों को देखकर हमारे भीतर आशा का संचार होता है—“......पौधों पर खिलते फूल/वृक्षों पर पकते फल/पक्षियों की उड़ान/नदी का प्रवाह/तितली का उड़ना/भ्रमर का गुंजन/बच्चे की किलकारी/माँ का ममत्व/आशा के स्रोत ही तो हैं.....”
प्रत्येक व्यक्ति के भीतर एक आग होती है। भीतर की आग असीम सामर्थ्य और शक्ति की प्रतीक होती है। दरअसल, यही भीतर की आग है, जो किसी भी असंभव कार्य को संभव बनाने की क्षमता रखती है। यदि हम इस आग का प्रयोग न करें तो समय के साथ वह ठंडी पड़ जाती है। कवि की ‘अग्नि जिव्हा’ कविता हमें अपने भीतर की आग का प्रयोग करने के लिए प्रेरित करती है—“....इसके पहले कि तुम्हारे भीतर/आग ठंडी पड़ जाए/उसे बाहर ले आओ/और उसे वहाँ भी ले जाओ/जहाँ आग की जरूरत है!....”
केवल जय और पराजय के भाव से जीने में जिंदगी, जिंदगी नहीं रह जाती, बल्कि प्रतिस्पर्धा बन जाती है। सतत प्रवाहमान नदी हमें जय-पराजय के भाव से परे होकर जीना सिखाती है—“....विजयी नहीं होती नदी/पराजित नहीं होती/केवल प्रवाहित होती है नदी।...”
जीवन, मृत्यु और उसके रहस्य को लेकर लेखकों, कवियों और दार्शनिकों में चिंतन होता रहा है। वैज्ञानिक यह मानने लगे हैं कि इस संसार से परे अनेक संसार और अनेक ब्रह्मांड भी हो सकते हैं। पुराना ब्रह्मांड ब्लैक होल में समा जाता है और फिर एक नया ब्रह्मांड आकार लेता है। इसी तरह हमारे जीवन का अनिवार्य सत्य मृत्यु भी नए जीवन का द्वार हो सकती है। हमें मृत्यु को सहज और सकारात्मक रूप में स्वीकार करना चाहिए। कवि की ‘नई जिंदगी’ कविता इसी बात की तस्दीक करती है—“.....संभवतः हर ब्लैक होल/प्रकृति का सर्वाधिक खतरनाक द्वार है/दूसरे किसी ब्रह्मांड में जाने का/जिस तरह मृत्यु एक द्वार है/नई जिंदगी के लिए!.....”
हम देखते हैं कि तथाकथित प्रबुद्धजन वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था के गिरते स्तर पर तंज कसते रहते हैं। जाति-धर्म, ऊँच-नीच का भेदभाव फैलाने वाले राजनीतिज्ञों को कोसते हैं। मगर स्वयं को समदृष्टि-संपन्न मानने वाले तथाकथित प्रबुद्धजन भी वामपंथ और दक्षिणपंथ में बँटे हुए हैं। अगर यह धरती सियासतदानों से संभल नहीं रही है, तो तथाकथित प्रबुद्धजनों में भी यह कुव्वत कहाँ है? कवि ने अपनी कविता ‘अनुत्तरित’ में तथाकथित प्रबुद्धजनों पर तीखा प्रहार किया है।
जिस तरह हमारे जीवन में खट्टे-मीठे पल आते हैं, वैसे ही कविताओं में शब्द आते हैं। कविताओं के शब्द चुभते हैं तो सहलाते भी हैं। फूल खिलता है और अपने सौंदर्य से हमें आनंदित कर देता है, पर फूल के खिलने और कविता के खिलने में अंतर है। फूल किसी खास मौसम में खिलता है, कविता हर मौसम में खिलती है। फूलों का सौंदर्य और महक सीमित है, जबकि कविता का सौंदर्य और उसकी महक असीमित है। कविता एक बार खिलती है और फिर सदा-सदा के लिए खिली रहती है। ‘कविता खिलती है’ कविता में कविता के महत्त्व को बिंबात्मक रूप में चित्रित किया गया है।
फेसबुक, व्हाट्सऐप और तमाम तरह के सोशल मीडिया की गिरफ्त में हमारी नई पीढ़ी किताबों से दूर होती जा रही है। इधर लोगों में किताबें पढ़ने की रुचि घटती जा रही है। रुचि घटने के साथ-साथ लोग इतने व्यस्त हो गए हैं कि वे किताबें पढ़ने के लिए वक्त नहीं निकाल पाते। उपभोक्तावाद, बाजारवाद और वैश्वीकरण ने लोगों की पढ़ने की आदत को प्रभावित किया है। हम भौतिकता के दबाव से उबर नहीं पा रहे हैं। किताबें पढ़ना और बौद्धिक-मानसिक संतुष्टि प्राप्त करना पिछड़ेपन की निशानी समझी जा रही है। ऐसे हालात में किताबों की दुनिया को सुरक्षित रखना तथा नई पीढ़ी में किताबें पढ़ने का संस्कार डालना बेहद जरूरी हो गया है। ‘किताबें’ कविता किताबों को लेकर उम्मीद बँधाती है। कवि आशावान हैं। वे लिखते हैं—“....तब भी किताबें/हमारे पास होंगी।...”
संग्रह के तीसरे खंड में ‘प्रेम और प्रकृति’ की कविताएँ संग्रहीत हैं। काव्य-संग्रह का नाम ‘नीलमणि’ कविता पर रखा गया है। यह इस खंड की पहली कविता है। ‘नीलमणि’ प्रकृति की कविता है, जिसमें दृश्य-बिंबों एवं रूपकों का सुंदर प्रयोग किया गया है। समुद्र प्रकृति के अंतर्मन का रूपक है। मगर मन की गहराई समुद्र की गहराई से कहीं अधिक होती है। कवि लिखते हैं—“.....एक अंतर्मन में डूबे/कई-कई मन..।” प्रकृति सचमुच रहस्यमयी होती है। अपना रहस्य स्वयं प्रकृति ही जानती है। प्रकृति का रहस्य समझने की क्षमता किसी में नहीं है, मगर एक सच्चा कवि प्रकृति के सौंदर्य में डूबकर उसका आनंद ले सकता है—“तुम किसी और को जानने देना नहीं चाहती/केवल मैं ही तो डूब पाता हूँ/इन पर्वतों, इन घाटियों में!”
कवि में गहरा पर्यावरणीय बोध है। खूबसूरत हरी-भरी धरती से पेड़ दिन-ब-दिन कम होते जा रहे हैं। पेड़, प्रकृति और धरती की चिंता कवि की चिंता में समाहित है। ‘वृक्ष-विहीन’ कविता में वे कहते हैं—“......क्या ही अच्छा होता कि/प्रकृति ने/वृक्षों को पाँव दे दिए होते/कम से कम वे/उस इलाके से/भाग तो खड़े होते/जहाँ बिजली की आरियाँ लिए लोग/उन्हें क़त्ल करने/आमादा रहते हैं।”
कवि अपनी कल्पना के सहारे कभी विगत की बात करते हैं तो कभी आगत की, किंतु वे अपने परिवेश और वर्तमान को कभी नहीं भूलते। वे अपनी युगीन परिस्थितियों के केवल मूकदर्शक नहीं होते, बल्कि उन्हें रचते भी हैं। कोविड काल की विषम परिस्थितियों को ‘सुरंग’ कविता में अभिव्यक्त करते हुए कवि लिखते हैं—“......माना कि अंधकार गहन है/रात भारी और/सुरंग लंबी है/पर डरो मत/धीरे-धीरे आगे बढ़ते चलो/मुहाने की ओर/तुम देखोगे कि/रोशन हो रही है सुरंग/और खुली दुनिया की ओर जाने वाला रास्ता/खुल रहा है.....।” ऐसे ही कवि अपने समय के विरोधाभास पर कविता की भाषा में टिप्पणी करते हैं। युद्ध से कभी शांति स्थापित नहीं हो सकती, मगर—“....अमन के वास्ते/जंगें जारी हैं....”
कवि की अधिकांश कविताओं में प्रयोगवादी कवियों की तरह नवीन कल्पना, नवीन भाव-उद्भावना और नवीन शिल्प-प्रयोग देखने को मिलते हैं। ‘पियानो के की-बोर्ड पर उतरते शब्द’ कविता में बिंबों की छटा अद्भुत है—“....रिमझिम बारिश के टुकड़े/तितलियों के कुछ रंगीन उड़ते पंख/गेंदे की कुछ केसरिया-पीली पंखुड़ियाँ/मीठे नीम की कुछ हरी पत्तियाँ/सलेटी रात की कुछ रेशमी कतरनें/तारों की नदी से छलकती कुछ चमकीली नीली बूँदें/पूर्णमासी के चंद्रमा से गिरती कुछ रजत डोरियाँ....।”
नवीन शब्दों का प्रयोग करने में कवि इतने माहिर हैं कि कोई भी सुधी पाठक उनके शब्दों की नवीनता, उनकी महीन बुनावट और यथोचित प्रयोग से चमत्कृत हुए बिना नहीं रह सकता। ‘गुमसुम-सी शाम’, ‘आह्लादक पुलक नर्तन’, ‘निस्सीम निर्विकल्प नीलगगन’, ‘उद्दाम आँधियाँ’ जैसे विशेषणात्मक शब्दों का प्रयोग करने में कवि सिद्धहस्त हैं।
रंगों का हमारे जीवन पर गहरा प्रभाव होता है। प्रकृति इतनी खूबसूरत इसीलिए लगती है, क्योंकि वह रंग-बिरंगी है। संग्रह की कविताओं को पढ़ने से पता चलता है कि कवि को रंगों से विशेष लगाव है। वे अपनी कविताओं में रंगों का प्रयोग बार-बार करते हैं। सफेद, नीला, हरा, काला, लाल, गेरुआ, सलेटी आदि रंगों का प्रयोग विशेष तौर पर किया गया है। प्रकृति-चित्रण की कविताओं में सलेटी रंग का प्रयोग सबसे अधिक बार हुआ है।
कवि बड़ी ही महीन दृष्टि से प्रकृति-चित्रण करते हैं। उनके प्रकृति-चित्रण में प्रकृति के सारे उपादान अनायास आ जाते हैं। उनकी कविताओं में धरती, अंतरिक्ष और समुद्र का सौंदर्य-चित्रण देखते ही बनता है। उनमें नदी, पहाड़, झरना जैसे अनेक दृश्यों को बिंबात्मक रूप में शब्दों में बाँधने की अद्भुत क्षमता है। उनके दृश्य-चित्रण में पूरा परिदृश्य पाठक के मानस-पटल पर प्रत्यक्ष हो जाता है। कवि दृश्य-बिंब का प्रयोग करने में पारंगत हैं। शब्दों के माध्यम से किसी भी दृश्य को जीवंत और साकार कर देने में कवि दक्ष हैं। उनकी अधिकांश कविताओं में दृश्य-बिंब का प्रयोग देखा जा सकता है। ‘अरुणोदय’ कविता में प्रातःकालीन बेला का अत्यंत आकर्षक चित्र खींचा गया है। इस कविता को पढ़ने से शमशेर बहादुर सिंह की ‘उषा’ कविता अनायास याद आ जाती है—“क्षितिज तक/नीला जल/अरुणोदय की/पीली, गुलाबी, सुनहली सूर्य-किरणों से/चमचमाता—/सृष्टि की/नीली आँखों में/प्रसन्नता की चमक/पलकें बंद मत करना/टूटे न कहीं/ये करिश्मा....।”
कवि रूपकों का प्रयोग करने में भी माहिर हैं। ‘रेशमा’ कविता में रेशमा नाम की लड़की के चित्रांकन में सुंदर रूपकों का प्रयोग किया गया है। ओस की एक बूँद, पीले पंखों वाली तितली, चंद्रकिरण, एक प्रेम-कविता, एक फाख्ता जैसे रूपकों के प्रयोग से रेशमा की मुखाकृति दृश्य-बिंब के सहारे साकार हो उठती है। कवि घूमने-फिरने के शौकीन रहे हैं। वे देश-विदेश के अनेक साहित्यिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेते रहे हैं। उन्होंने फ्रांस, बेल्जियम, जर्मनी, ऑस्ट्रिया, स्विट्जरलैंड, इटली, वेटिकन सिटी, हांगकांग, मकाऊ आदि देशों की साहित्यिक यात्राएँ की हैं। एक चेतस रचनाकार अपनी यात्रा के अनुभवों से अप्रभावित नहीं रह सकता। इस काव्य-संग्रह में ऐसी कई कविताएँ हैं, जिनकी पृष्ठभूमि उनकी विदेश-यात्राओं पर आधारित है। ‘काँच का समुद्र’ एक ऐसी ही कविता है, जिसे कवि ने अपनी मॉरीशस यात्रा के दौरान पारदर्शी समुद्र की खूबसूरती से प्रभावित होकर लिखा था। कविता में रूपक और दृश्य-बिंब का प्रयोग देखते ही बनता है—“समुद्र में पानी नहीं था/प्रकृति ने/नीला-हरा शीशा पिघलाकर/समुद्र में डाल दिया था/पहली बार देखा/काँच का समुद्र!”
इस तरह उनकी कविताओं में गहरा जीवन-राग, अस्मिता-बोध, ज्ञान-विज्ञान, धर्म, अध्यात्म, प्रकृति, प्रेम एवं मानवीय संबंधों से उपजे अंतर्द्वंद्व व्याप्त हैं। रचनाकारों में वैयक्तिक भिन्नता के साथ-साथ रचनात्मक एवं शैलीगत भिन्नता भी देखी जाती है। मनजीत जी की कविताओं में कहन की जो शैली है, वह अपनी विशिष्टता के कारण आसानी से पहचानी जा सकती है। वैश्वीकरण के इस दौर में भाषाई उदारीकरण कवि की कविताओं में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। कवि अपनी कविताओं में जहाँ एक ओर संस्कृतनिष्ठ तत्सम शब्दों का प्रयोग करते हैं, वहीं दूसरी ओर उर्दू और अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग करने से भी नहीं हिचकते। भाषाई लचीलेपन के कारण ही उनकी कविताओं से भावबोध एवं सौंदर्यबोध सहजतापूर्वक ग्राह्य होता है। मेरा विश्वास है कि भाव-प्रेमी एवं सौंदर्य-प्रेमी पाठकों को उनकी कविताएँ निःसंदेह प्रभावित करेंगी।

कृति — ‘नीलमणि’ (कविता-संग्रह)
कवि — नीरज मनजीत
प्रकाशक — इंडिया नेट बुक्स प्राइवेट लिमिटेड, दिल्ली

समीक्षक -- नरेंद्र कुमार कुलमित्र
कवर्धा, छत्तीसगढ़
मो. 9755852479

हम बोलेंगे - 22. 02.23

हम बोलेंगे,
हर बार की तरह,
हर बार हम बोलेंगे...
हमारे खिलाफ साजिश होगी,
पर खिलाफत में
हम बोलेंगे...
जलने से पहले
आग की तरह बोलेंगे।
नफरतियों से
प्रेम में बोलेंगे।
सच के लिए,
हर झूठ के खिलाफ बोलेंगे।
जुबान काट दोगे,
तो आँखों से बोलेंगे,
मौन में बोलेंगे।
आँखें फोड़ दोगे,
तो स्पर्श से बोलेंगे।
अगर मार दोगे,
तो सपनों में बोलेंगे,
तुम्हारी स्मृतियों में बोलेंगे।
हर बार की तरह,
हम हर बार बोलेंगे...!!!
-- नरेंद्र कुमार कुलमित्र
9755852479

कहने और ना कहने के संबंध में - 11 03 23

हम जो कहते हैं
वही सुने जाते हैं,
उसी से अर्थ निकाले जाते हैं,
उसी से बात बनती है,
उसी से बखेड़े खड़े होते हैं।
यह जरूरी नहीं कि
हम जो कहते हैं,
उसका वही अर्थ निकाला जाए।
उसका वह अर्थ भी निकाला जा सकता है
जो हम बिल्कुल भी नहीं करना चाहते।
कई बार कहे जाने पर अफसोस होता है,
कई बार कहे जाने पर नाज़ होता है,
कई बार कहकर फँस जाते हैं,
कई बार कहकर फँसने से बच जाते हैं।
हम कई बार सोचते हैं,
मगर कह नहीं पाते।
कहे जाने पर क्या सोचा जाएगा,
यह सोचकर कहने से रह जाते हैं।
कई बार “जो होगा, देखा जाएगा” सोचकर
कह डालते हैं जो कहना होता है।
ऐसे में कई बार बन जाता है काम,
कई बार बुरी तरह बिगड़ जाता है काम।
कहते हैं कि कहने से पहले
सोचा जाना चाहिए,
पर सोचते-सोचते कई बार
कहा नहीं जाता।
कहे जाने के लिए यह जानना जरूरी होता है
कि कब कहा जाए,
कैसे कहा जाए
और कितना कहा जाए।
अलग-अलग समय में
दोनों ही खतरनाक होते हैं—
कहा जाना
और न कहा जाना।

-- नरेन्द्र कुमार कुलमित्र
9755852479

बारिश


​बारिश तो देखी ही होगी आपने...
कभी रिमझिम, तो कभी मूसलाधार!
​मानसून की बारिश,
शीत की बारिश,
और बेमौसम बारिश...
​लगातार बारिश से नदियों में बाढ़ आ जाती है,
बह जाते हैं लोग, पेड़-पौधे, फसलें और घर-द्वार।
​पर क्या आपने देखी है किसी के भीतर की बारिश...?
​भीतर की बारिश से
सारा तन-मन भीग जाता है,
ढह जाती हैं अहम की दीवारें,
टूट-टूट कर बह जाती हैं बंदिशों की चट्टानें।
​मौसम विज्ञानी अनुमान लगा सकते हैं उस बारिश का,
पर इस बारिश का केवल अहसास ही होता है।
​यह बारिश है हर मौसम की,
यह सुहाती है रिमझिम भी, मूसलाधार भी...
​जितनी ज़रूरी होती है वह बारिश—
खेतों के लिए, पीने के लिए, जीने के लिए,
उतनी ही ज़रूरी है यह बारिश—
आदमी को 'आदमी' होने के लिए...!

​-- नरेन्द्र कुमार कुलमित्र
02.03.23
9755852479

लोकन बुढ़िया

लोकन बुढ़िया
​स्कूल परिसर के ठीक सामने,
बरगद की छांव तले,
बेहद मैली सूती साड़ी पहने,
मुर्रा, ज्वार, जोंधरी के लड्डू
और इमली, बिही (अमरूद), बेर जैसे मौसमी फल बेचती...
वह लोकन बुढ़िया,
आज भी याद है मुझे।
​उस अकेली बुढ़िया को
हम स्कूल के सभी बच्चे जानते थे,
पर आश्चर्य तो यह था कि
उस बुढ़िया की धुंधली आंखें भी
हम सबको पहचानती थीं,
उसकी स्मृति में हम सबका नाम बसा था।
​हमारे पांच-दस पैसों की ख़रीद से
उसे कितना फ़ायदा होता था,
हम नहीं जानते थे;
पर वह रोज़ नियत समय पर
अपने ठीहे पर बैठी मिलती थी।
​अपार स्नेह और सहानुभूति से भरी
वह लोकन बुढ़िया,
भांप लेती थी हमारे चेहरों के भाव,
पढ़ लेती थी हमारी आंखों की भाषा।
​कभी हमारे पास पैसे न होने पर
वह भूल जाती थी—
अपना व्यावसायिक धर्म,
हमारी दी हुई गालियां,
और हमारा चिढ़ाना...
और यूं ही थमा देती थी खाने को लड्डू!

​-- नरेंद्र कुमार कुलमित्र
24.02.23
9755852479

शोकातुर लोग : जन सरोकार की कविताएँ 20.02.23

शोकातुर लोग : जन सरोकार की कविताएँ
कृति : शोकातुर लोग (कविता-संग्रह)
कवि : समयलाल विवेक
प्रकाशक : नोशन प्रेस, 2022

वरिष्ठ कवि एवं पत्रकार समयलाल विवेक का शोकातुर लोग सद्यः प्रकाशित काव्य-संग्रह है। यह उनका पहला काव्य-संग्रह है, जिसमें संकलित कविताओं में उनके सुदीर्घ जीवनानुभवों को महसूस किया जा सकता है। इस संग्रह में कुल पैंसठ कविताएँ सम्मिलित हैं। अधिकांश कविताएँ आकार में छोटी हैं, मगर उनकी भावभूमि अत्यंत गहरी है। उनकी कविताएँ जीवन से जुड़ी हैं, जिनमें जीवन के लगभग सभी रंग दिखाई देते हैं। उनकी कविताओं में प्रेम है, पीड़ा है, खीझ है और गहरा आक्रोश भी। तमाम प्रकार की भावनात्मक उथल-पुथल से भरी उनकी कविताओं में पलायन कहीं भी नहीं है। उनकी कविताएँ डटकर अपने और अपने लोगों की बात कहती नजर आती हैं। इस संग्रह में प्रकाशित कविताओं को हम उनके चालीस-पैंतालीस वर्षों के जीवनानुभवों का निचोड़ कह सकते हैं।
यह सच है कि कवि जितना सहृदय होता है, उतनी ही उसमें प्रतिरोध की क्षमता भी होती है। इसीलिए विवेक अपने लोगों पर कविता लिखते समय जितने भावुक नजर आते हैं, उतने ही शोषण-तंत्र पर लिखते हुए आक्रोशित और कठोर भी दिखाई देते हैं। कवि गहरे यथार्थ से जुड़े हुए हैं। वे अपनी कविताओं में कहीं भी हवा-हवाई बातें नहीं करते। अपने युग से संपृक्तता कवि का अनिवार्य गुण होती है। विवेक की कविताओं में युगबोध और लोकचेतना का भाव आद्यंत समाहित है। वे अपने आसपास से ही कविता के लिए उपादान ढूँढ़ लेते हैं। अपनी कविताओं के जरिए वे गाँव-गँवई, खेत-खलिहान, गरीब किसान और मजदूर आदि की बात करते हैं। यानी उनकी कविताएँ ग्रामीण संस्कृति और जनजीवन के पक्ष में खड़ी नजर आती हैं।
लोकधर्मिता का भाव उनकी कविताओं में यत्र-तत्र बिखरा हुआ है। यदि रचनाकार केवल निजी प्रेम या काल्पनिक बातों पर ही लिखता रहे तो उसके कवि-कर्म और लेखकीय धर्म पर सवाल उठना स्वाभाविक है। जब देश और दुनिया में दहकती हुई ज्वलंत घटनाएँ घट रही हों, ऐसे में कोई चेतस रचनाकार केवल और केवल स्व पर केंद्रित आत्ममुग्धता में कैसे जी सकता है? विवेक की कविताओं में लोक की पीड़ा स्व-पीड़ा बन जाती है। शोकातुर लोग इस काव्य-संग्रह की शीर्षक कविता है। इस कविता में मृत्यु के बहाने लोकजीवन में प्रचलित मृत्यु-संस्कार और उसके क्रिया-कर्म को बिंबात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया है। लोक में मृतक के लिए ‘नहाऊर’ निकलने की परंपरा प्रचलित है। शोकग्रस्त परिजन कतारबद्ध होकर एक साथ नहाने जाते हैं और एक साथ लौटते हैं। नहाऊर की कतार को आते देखकर लोग रास्ता दे देते हैं और किनारे खड़े हो जाते हैं—
“खोर बहारतीं बेटियाँ
डेहरी लिपती बहुएँ और
धूल के घरौंदे बनाते नंग-धड़ंग बच्चे
सब ओट में हो
रास्ता छोड़ते गए नहाऊर के लिए।”
(पृ. 3)
इस कविता में धर्म और मृत्यु-संस्कार के नाम पर पंडों द्वारा किए जाने वाले लूट-खसोट तथा लोगों को मूर्ख बनाए जाने की रस्म पर भी व्यंग्य किया गया है—
“पहुंचते-पहुंचते बिलासपुर, कटनी या नैनी
पहचान लिया जाएगा वह और
लग जाएंगे उसके पीछे
रघुवीर, महावीर, जगन्नाथ और
जाने किस-किस नाम के पंडे के गुमाश्ते।
उसके आजा, बाबा, दादा, परदादा, पास-पड़ोस
और मठाधीशों के नाम जो गिनाएगा
बन रहेगा मझला उसी का मुर्गा।”
(पृ. 5)
संग्रह की कविताओं में कवि का जनवादी स्वर मुखरित हुआ है। वे इस कविता-संग्रह की ‘अपनी बात’ में यह स्वीकार करते हैं कि, “रचना चाहे किसी भी विधा में लिखी गई हो, यदि जनवादी (छद्म नहीं) है तो वह आम व खास पाठकों को एकाधिक बार पढ़ने के लिए जरूर बाध्य करेगी।” इस कथन के संदर्भ में मुझे लगता है कि एक ईमानदार रचनाकार में जनवादी गुण होना आवश्यक है। उनकी कविता ओ काया में यही जनवादी तथा प्रगतिवादी स्वर समाहित है, जिसमें पीड़ितों की सेवा करने और पीड़कों को राख कर देने का आह्वान किया गया है—
“माचिस बन
ओ काया
अंतस में धर आग की अनेक तीलियाँ
फिर एक-एक कर सुलग
पीड़क को राख कर
पीड़ित की सेवा।”
(पृ. 6)
कोई भी देश और वहाँ की जनता अभिन्न होते हैं। देश लोगों से बनता है और लोगों से ही देश बनता है। देश आगे बढ़ जाए और लोग पीछे रह जाएँ अथवा लोग आगे बढ़ जाएँ और देश पीछे रह जाए, तो यह विरोधाभासपूर्ण स्थिति विडंबनापूर्ण ही कही जाएगी। कवि इस विडंबना को देश और लोग कविता में इस प्रकार व्यक्त करते हैं—
“आज देश जरूरत से ज्यादा
आगे बढ़ गया है
हम बहुत ही पीछे छूट गए हैं
कैसा यह देश
कैसे हैं लोग
कुछ भी तो नहीं आता समझ में
आखिर तुम ही बताओ हम क्या करें
क्या न करें ताकि
हमेशा-हमेशा के लिए देश और लोगों में
बना रहे तालमेल।”
(पृ. 14-15)
कवि तथाकथित महापुरुषों को भी अपनी कविता के माध्यम से कड़े शब्दों में खबरदार करते हुए नजर आते हैं, जो अब तक जीवन और सृष्टि के बारे में घिसी-पिटी, रटी-रटाई बातें करते आ रहे हैं। जिनकी बातों में न तो नवीनता है और न ही वैज्ञानिकता। महापुरुषों खबरदार कविता की पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं—
“महापुरुषों खबरदार
यहाँ बंद हो चुके हैं संभावनाओं के सब द्वार
अब देखना नहीं इधर कभी मुड़कर
महापुरुषों, बंद करो बकवास
जीवन-मर्म, सृष्टि-संरचना और
संचालन की वही बातें दोहराओगे
और कितनी बार
सुन-सुन हमारे कान पक गए हैं।”
(पृ. 16)
जीवन में मौन रहने का अपना महत्व हो सकता है, लेकिन जहाँ बोला जाना चाहिए, वहाँ भी मौन साधे बैठे रहना उचित नहीं है। अन्याय और अनीति को अपनी आँखों के सामने देखते हुए सुधीजनों का मौन रह जाना महाभारत जैसी त्रासदी का कारण बना था। आज देश भी अनेक प्रकार की विडंबनापूर्ण परिस्थितियों से गुजर रहा है। मगर बुद्धिजीवी और कलमकार सत्ता के पोषकों के खिलाफ लिखने और कुछ कहने से डर रहे हैं। मौन की भाषा कविता का अंश प्रस्तुत है—
“अनगिनत अबोले, अलिखित
शब्दों की मजबूत
तालाबंद पिटारी है मौन
चाबी है तो खोलो
वरना इसे तोड़ो।”
(पृ. 17)
संसार में फैली असमानता को देखकर कवि का मन क्षुब्ध हो जाता है। ऐसा क्यों है कि देश की समृद्धि और खुशहाली कुछ गिने-चुने लोगों के हिस्से में आती है? रोशनी पर चंद लोगों ने अधिकार जमा लिया है और बाकी सब अंधेरे में जीने के लिए अभिशप्त हैं। हमारा कसूर क्या है कविता में कवि सूरज से ही इसका उत्तर माँगता है—
“आना तो सूरज
सार्वजनिक इस सृष्टि-खंड पर
किसी दिन
भेष बदलकर
फिर बताना हमें कि
तुम जो भी बिखेरते हो सोन-किरणें
वह क्यों नहीं पहुँचती हम तक
हमारा कसूर क्या है।”
कवि का ईश्वर के अस्तित्व पर संदेह करना गैरवाजिब नहीं है। ईश्वर के नाम पर पाखंड हो रहा हो और तमाम गुणों से विभूषित ईश्वर का अता-पता न हो, ऐसे में एक संजीदा रचनाकार द्वारा ईश्वर के अस्तित्व पर संदेह करना स्वाभाविक ही है। ईश्वर कविता की पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं—
“रहने को तो
धर्मग्रंथों,
संतों की वाणी,
बच्चों की किताब,
अनभिज्ञों के दिल-दिमाग,
मंदिर, मस्जिद,
गिरजाघर, गुरुद्वारे में हो,
नहीं हो तो बस आतताइयों के पास।
हे ईश्वर, देर से आने का
क्या फायदा।”
यूं तो जीने की चाहत हर प्राणी में होती है, मगर दूसरे के हित के लिए जीने की इच्छा रखना हर किसी के वश की बात नहीं है। इसके लिए विराट हृदय और उदार दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है। आज उपभोक्तावादी संस्कृति के चंगुल में फँसा मनुष्य ‘परहित सरिस धरम नहिं भाई’ की भावना को भूलता जा रहा है। असंवेदनशील होते समाज और लोगों के लिए कवि की लालसा कविता बेहद प्रासंगिक है—
“पीपल का सूखा पत्ता मैं
मेरा हरापन लौट आता
किसी गर्भवती बकरी के मुँह में
समा जाने की
लालसा है बस।”
(पृ. 32-33)
पर्यावरण की चिंता आज वैश्विक चिंता बन गई है। विकास के लिए जरूरी शहरीकरण और औद्योगीकरण अब कई बार विनाश का कारण बनने लगे हैं। पर्यावरण के लिए सबसे जरूरी पेड़ काटे जा रहे हैं और जंगल सिमटते जा रहे हैं। ऐसे हालात में एक संजीदा कवि बचपन में पेड़ों के साथ बिताए पलों को याद करता है—
“कितने ही नामों से
पेड़ तुझे याद करें
तुमने ही जमीन से ऊपर उठाया
आसमान दिखाया।”
(पृ. 35)
बाजारवाद के इस दौर में लुटेरा और शिकारी जैसे शब्द बाजार के पर्यायवाची प्रतीत होने लगे हैं। कवि अपनी कविता लूटेरे के माध्यम से लोगों को मायावी बाजार के भ्रमजाल से बचने के लिए आगाह करता है—
“चाहते हो यदि
अपनी सलामती तो
चुपचाप निकल लो
इस बेरहम बाजार से
वरना फँस जाओगे
मक्खी जैसे मकड़जाल में।”
(पृ. 42)
कवि को अपने युगीन समय की बड़ी चिंता है। असंवेदनशील समय को देखकर कवि गहरी चिंता में डूब जाता है और वही चिंता उसकी कविताओं में प्रस्फुटित होती है। सोख्ता समय आकार में छोटी कविता है, मगर इसमें समय की गहरी चिंता समाहित है—
“लोग सच ही
कहते हैं
सोख्ता समय है
शनैः-शनैः
धरती के सत्व को
सोख रहा वही।”
कवि को हम हथियारबंद सिपाही कहें तो कविता उसका हथियार होती है। कवि अपनी कविता के माध्यम से लोगों की धारणाओं और विचारों को बदलने की क्षमता रखता है। करिश्मा कविता में कविता के इसी महत्व की ओर संकेत किया गया है—
“कवि ने
लिखी कविता
वह जादू की छड़ी बन गई
उस छड़ी ने
दिखाना शुरू किया करिश्मा
कवि ने
जैसा चाहा
संसार को बदल दिया।”
(पृ. 54)
इसी तरह चिंगारी की मानिंद कविताएँ शीर्षक कविता में कविता की अमरता को चित्रित करते हुए कवि लिखते हैं—
“दुनिया में
कुछ भी नहीं बचेगा
तब भी बची रहेंगी
राख के ढेर में
चिंगारी की मानिंद कविताएँ।”
कवि बाह्य आडंबर करने वाले तथाकथित धार्मिकों को अपनी कविता में जोरदार ढंग से लताड़ता है। शब्दों के माध्यम से आडंबर और पाखंड पर प्रहार करने की परंपरा लेखकों और कवियों की प्रमुख विशेषताओं में रही है। विवेक की कविता सबसे बड़ा विषधर में यह खूबी तीक्ष्णता के साथ दिखाई देती है—
“उसने जो हृष्ट-पुष्ट शरीर पर
रंग-बिरंगा झकास वस्त्र सजाया है
माथे पर चंदन-तिलक लगाया है
सफाचट या लंबे घने केशों वाला
दिन-रात चेले-चपाटियों से घिरा
सदा सिंहासन पर विराजमान
वही है देव का अवतार
बाकी सब दीन-हीन, सेवक बेकार
वही है जनाब धरती का
सबसे बड़ा विषधर।”
(पृ. 63)
अभिजात्य शोषक वर्ग के प्रति आक्रोश प्रकट करते समय कवि के शब्दों में भाषाई भदेसपन भी स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। विडंबनात्मक परिस्थितियों से उपजी अपनी भावनाओं को यथावत व्यक्त करने के लिए भाषाई भदेसपन से उन्हें जरा भी गुरेज नहीं है—
“उठते-बैठते
चलते-फिरते
जागते-सोते
दिन-रात
जोरदार हम
तुम पर
पादते हैं।”
(पृ. 69)
लोकतंत्र में यदि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता न हो तो उसे लोकतंत्र क्योंकर कहा जाए? सब कुछ देखते-सुनते हुए भी गूँगे-बहरे की तरह प्रतिक्रिया न कर पाना लोकतंत्र की पहचान नहीं हो सकती। परिस्थितिजन्य विवशता भले ही हो सकती है, पर सामयिक हालात के प्रति लोगों में आक्रोश भरा हुआ है। कवि अपनी कविता गूँगा बहरा आदमी में भाषाई भदेसपन के साथ इसी स्थिति की ओर संकेत करता है—
“चमकीली आँखों से वह
भाँप लेता है
हर मन की बात
मुस्कराकर
अपनी बेबसी बताता है
गूँगा बहरा आदमी
उसे कभी मत दिलाना गुस्सा
नहीं तो वह खंखारकर थूक देगा
तुम्हारे चेहरे पर।”
(पृ. 71-72)
कवि अपनी कविता अखबार के लोग में पत्रकारिता के महत्व को बड़ी संजीदगी के साथ व्यक्त करता है—
“अखबार के लोग
सृष्टि के पहरेदार हैं
अखबार के लोग
पानी, रोशनी और हवा हैं
उनकी पहुँच सब जगह है
अखबार के लोग
अपना पेट रोटी से नहीं
खबरों से भरते हैं।”
(पृ. 77-78)
अव्यवस्था और विसंगति के प्रति उनकी कविताओं में आक्रोश का भाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। अपनी कविता इक्कीसवीं सदी का गीत में वे अव्यवस्था के लिए जिम्मेदार लोगों को सबक सिखाने की बात करते हैं। पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं—
“बहुत सहे, अब हम न सहेंगे
मर-मर के अब हम न जिएँगे
बदहाल किया है जिसने हमें
उसको हम सबक सिखाएँगे
कभी न धरती दरक सकेगी
कभी न टूटेगा आकाश।”
(पृ. 93)
इसी तरह क्रांति गीत कविता में समाजवाद का समर्थन करते हुए कवि बदलाव के लिए शोषकों को तोड़ने और पीड़ितों को एकजुट करने का आह्वान करता है—
“क्रांति गीत गाते
लहराते ध्वज लाल
तोड़ते चले, जोड़ते चले।”
और आगे—
“आएगा समाजवाद
भरसक प्रयास करें
लुटते चलें, बाँटते चलें
कदम-कदम....”
(पृ. 96-97)
कविता-संग्रह की अंतिम कविता खट्टा-मीठा बचपन में कवि अपने बचपन की यादों को शब्दों में समेटने का प्रयास करता है। किसी साहित्यकार के पास ही यह विशिष्ट कौशल होता है कि वह अपनी रचना-विधा में अपनी बीती यादों को शब्दबद्ध कर उन्हें बार-बार जी लेने का अवसर बना ले। कवि की इस कविता के माध्यम से हम उसके बचपन के खेलों और क्रियाकलापों से रूबरू होते हैं—
“तब उसी के संग हम खेला करते
घानीमुनि, तियो, टीप, चूड़ी लुकौला,
आँख-मुंदौला, नदी-पहाड़, भुनुन, कौन सारंग,
चाल गोटी, तिरी चौक, कुकुर-बिलई,
अंधियारी-अंजोरी, घोर-घोर रानी, चिंगरी,
बरबट्टी, फुम्मे फू..”
इस तरह हम देखते हैं कि कवि के भाव-पक्ष में उसका पूरा परिवेश समाहित है। इसमें उसकी रोजमर्रा की जिंदगी है, घर है, परिवार है, समाज है, तमाम समस्याएँ हैं, देशभक्ति और थोथे राष्ट्रवाद पर सवाल हैं तथा नदी-पहाड़ के साथ जुड़ी खूबसूरत प्रकृति भी है। उनके कहन में सादगी है और कहीं भी बनावट नहीं है। उनकी कविताओं में परिस्थितिजन्य करुणा है, विभत्सता है और विस्मय भी है। कविता की भाषा बेहद सहज, सरल और आम बोलचाल की है। सादृश्य-विधान के अंतर्गत उपमा अलंकार का प्रयोग अनायास और स्वाभाविक रूप से हुआ है। कविताओं में दृश्य और श्रव्य बिंबों का पर्याप्त प्रयोग हुआ है। उनकी अधिकांश कविताएँ लोकभावना और जनसरोकार पर केंद्रित हैं, इसलिए पाठक उनकी कविताओं से बड़ी सरलता और सहजतापूर्वक जुड़ सकते हैं। यही शोकातुर लोग की सबसे बड़ी विशेषता है कि इसमें कवि अपने समय और समाज से विमुख होकर कविता नहीं रचता, बल्कि अपने आसपास के जीवन, लोक, श्रम, संघर्ष, प्रकृति, राजनीति, व्यवस्था और मनुष्य की पीड़ा को अपनी रचनात्मक संवेदना का आधार बनाता है। लगभग चार-पैंतालीस वर्षों के जीवनानुभवों से निकली ये कविताएँ अपने समय की बेचैनी, जनजीवन की पीड़ा और परिवर्तन की आकांक्षा को स्वर देती हैं। इस अर्थ में शोकातुर लोग केवल शोक की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि शोक से प्रतिरोध और प्रतिरोध से बेहतर समाज की तलाश की कविताएँ भी हैं।
नरेंद्र कुमार कुलमित्र
कवर्धा, छत्तीसगढ़
मो. 9755852479

नहीं लिख पाता

नहीं लिख पाता मैं—
अपनी खुशियों को खुशियों की तरह,
ना उदासियों को उदासियों की तरह।
​ना विवशताओं को विवशताओं की तरह,
ना प्रेम को प्रेम, ना घृणा को घृणा की तरह।
कभी नहीं उकेर पाता
अपनी पीड़ा को पीड़ा की तरह।
​खुद को कभी
पूरा का पूरा व्यक्त नहीं कर पाता,
कागज़ पर लिखे तमाम शब्द
बेबस से नज़र आते हैं...
​और आखिरकार,
मैं एक लाचार सा अव्यक्त रह जाता हूँ!

- नरेन्द्र कुमार कुलमित्र 
 19.01.23