‘बगरय छंद अंजोर’ छत्तीसगढ़ी जनभाषा के उदीयमान कवि सुखदेव सिंह अहिलेश्वर का सद्यः प्रकाशित छत्तीसगढ़ी काव्य-संग्रह है। इस संग्रह की सभी रचनाएँ छंदबद्ध हैं। काव्य-संग्रह में कुल 77 छंदबद्ध रचनाएँ हैं और पूरे संग्रह में 48 प्रकार के छंदों का प्रयोग हुआ है। छंदों की इतनी विविधतापूर्ण उपस्थिति यह प्रमाणित करती है कि कवि को छंदों से न केवल गहरा लगाव है, बल्कि उन्हें छंद-विधान का विशेष ज्ञान भी है। छंदबद्ध रचना करना जितना श्रमसाध्य होता है, उससे कहीं अधिक कठिन होता है छंदबद्ध इकाई में भावों और अर्थों को सुरक्षित रखते हुए अपनी बात को प्रभावी ढंग से कह पाना। निश्चित शब्द और मात्रा के अनुशासन में बँधकर अपनी पूरी बात कह देना कठोर साधना का ही प्रतिफल कहा जा सकता है। इस दृष्टि से ‘बगरय छंद अंजोर’ का महत्व और बढ़ जाता है।
हिंदी साहित्य में छंदबद्ध रचना का इतिहास अत्यंत पुराना है। हिंदी साहित्य के प्रारंभिक तीनों कालों—आदिकाल, भक्तिकाल और रीतिकाल—में मुख्यतः छंदबद्ध रचनाएँ ही हुईं। चंदबरदाई की कृति ‘पृथ्वीराज रासो’ में छंदों की इतनी विविधता दिखाई देती है कि उस ग्रंथ को छंदों का ‘अजायबघर’ कहा गया है। आधुनिक काल में भी भारतेंदु तथा द्विवेदी युग के शीर्षस्थ रचनाकारों ने हिंदी कविता में संस्कृत और हिंदी के विविध छंदों का प्रयोग किया। तोमर, पद्धरी, चौपाई, दोहा, रोला, सोरठा, उल्लाला, गीतिका, सरसी, हरिगीतिका, तांटक, वीर या आल्हा, भुजंगी, शालिनी, इंद्रवज्रा, वंशस्थ, भुजंगप्रयात, द्रुतविलंबित, तोटक, वसंततिलका, मालिनी, मंदाक्रांता, शार्दूलविक्रीडित, सवैया, रूप घनाक्षरी, कवित्त, कुंडलिया, बरवै, छप्पय, पुष्पिताग्रा, लावणी और त्रिभंगी आदि इसके प्रमुख उदाहरण हैं। छंद की इस समृद्ध परंपरा में ‘बगरय छंद अंजोर’ अपनी छंद-विविधता के कारण एक उल्लेखनीय कृति के रूप में सामने आती है।
छत्तीसगढ़ी साहित्य का प्रारंभ गाथा युग, लगभग 1000 ई. से माना जाता है। तब से लेकर आज तक छत्तीसगढ़ी साहित्य की पद्य और गद्य दोनों विधाएँ निरंतर समृद्ध होती रही हैं। छत्तीसगढ़ी साहित्य को वस्तुतः छत्तीसगढ़ी लोकसंस्कृति का आख्यान कहा जा सकता है। इसमें लोक की पीड़ा, उसके सुख-दुख, संघर्ष, उल्लास और जीवनानुभवों को सहज रूप में अनुभूत किया जा सकता है। गाथा युग से जन्मा छत्तीसगढ़ी साहित्य का छोटा-सा पौधा आज विशाल वटवृक्ष का रूप ले चुका है। छत्तीसगढ़ के लोक साहित्यकार समकालीन जीवन के विविध विषयों पर अपनी लेखनी चला रहे हैं। प्रेम-चित्रण की एकांगिकता से आगे बढ़कर विषयों की विविधता अब छत्तीसगढ़ी साहित्य की विशेषता बनती जा रही है। भाषाई लालित्य, सहजता और आत्मीयता के कारण छत्तीसगढ़ी साहित्य जनमन के बेहद करीब है। विशेष रूप से छत्तीसगढ़ी गीत और कविता अपनी गेयता एवं मधुरता के कारण सर्वाधिक लोकप्रिय हैं। ‘बगरय छंद अंजोर’ इसी समृद्ध लोकधर्मी परंपरा को आगे बढ़ाने वाली कृति है।
प्राचीन काल से ही अनेक रचनाकारों में अपनी रचना के प्रारंभ में ईश्वर या गुरु-वंदना करने की परंपरा रही है। ईश्वर या गुरु-वंदना के साथ रचनाकर्म प्रारंभ करने के पीछे अपने रचनाकर्म को निर्बाध बनाए रखने की कामना के साथ-साथ अपने इष्टदेव या गुरु के प्रति प्रेम, श्रद्धा और कृतज्ञता का भाव भी निहित रहता है। आलोच्य कृति ‘बगरय छंद अंजोर’ की पहली रचना ‘सुन के गुन’ (दोहा भजन) में रचनाकार के जीवन और रचनाकर्म का मार्ग प्रशस्त करने वाले गुरुओं तथा महापुरुषों के प्रति कृतज्ञता और प्रेरणा का भाव दिखाई देता है। कवि नानक, तुलसीदास, कबीर, रहीम, रसखान और घासीदास जैसे महापुरुषों को स्मरण करते हैं, वहीं छत्तीसगढ़ के विभूति रचनाकार कोदूराम ‘दलित’, सुंदरलाल शर्मा, श्यामलाल, भानु, विप्र, सुखलाल, कपिलनाथ, नरसिंह और मनोहर दास आदि के प्रति भी श्रद्धावनत दिखाई देते हैं—“पढ़ कवि कोदूराम ला/ पढ़ ले सुंदरलाल/ श्यामलाल के संग पढ़/ भानु विप्र शुकलाल।” इस आरंभ से ही कवि की साहित्यिक संस्कारभूमि और अपनी परंपरा के प्रति सम्मान का परिचय मिलता है।
‘बगरय छंद अंजोर’ में भावगत एवं शिल्पगत दोनों प्रकार की विविधता दिखाई देती है। कवि ने अपने समाज और परिवेश से जुड़े उन तमाम विषयों को अपनी रचनाओं में समाहित किया है, जो उनके अनुभव क्षेत्र में आए हैं। उनकी कविताओं में देशप्रेम, प्रकृति-चित्रण, छत्तीसगढ़ी संस्कृति का चित्रण, सामाजिक समस्याओं का विवेचन, मजदूर-किसान के जीवन की विसंगतियों का चित्रण तथा विभूतियों के प्रति आदरभाव प्रमुखता से दिखाई देता है। संवेदनशील रचनाकार अपनी रचना में केवल भोगे हुए यथार्थ का चित्रण नहीं करता, बल्कि अपनी दूरदर्शी सोच से बेहतर संभावनाओं को भी व्यक्त करता है। सामान्य परिस्थितियों में नीतिपरक संदेशों की पुनरावृत्ति उबाऊ लग सकती है, लेकिन जब सामाजिक समस्याओं की पुनरावृत्ति हो रही हो तो सुधारात्मक संदेशों की पुनरावृत्ति भी आवश्यक हो जाती है। कबीर, रहीम और वृंद के नीतिपरक दोहे इसी कारण हर युग में प्रासंगिक बने रहे हैं। इस कृति में भी अनेक ऐसी पंक्तियाँ हैं, जिनमें व्यवहारिक ज्ञान और सामाजिक संदेश निहित हैं—“जे घर अंगना मा रथे/ अंवरा तुलसी लीम/ जादातर आवय नहीं/ ओ घर बइद हकीम।” इसी तरह शराब की सामाजिक बुराई पर कवि कहते हैं—“टठिया लोटा बेच के/ पीयत दारु मंद/ ते मनखे के जान ले/ दिन बांचे हे चंद।” इन पंक्तियों में लोकानुभव से उपजा जीवन-बोध और सामाजिक सरोकार दोनों दिखाई देते हैं।
इस कृति में हिंदी साहित्य के भक्तिकाल की अनेक विशेषताओं को भी देखा जा सकता है। ईश्वर के प्रति आस्तिकता और श्रद्धाभाव, गुरु की महत्ता, मानवता की भावना, सामाजिक एवं धार्मिक विसंगतियों का चित्रण, समाज-सुधार की भावना तथा नैतिक संदेश जैसी विशेषताएँ संग्रह के अनेक छंदों में मिलती हैं। भक्तिकाल में जिस प्रकार धार्मिक उन्माद और अंधविश्वास समाज में व्याप्त था, उसकी अनेक विकृत छवियाँ आज भी हमारे आसपास दिखाई देती हैं। चिंता की बात यह है कि ये परिस्थितियाँ थमने के बजाय अनेक स्तरों पर बढ़ती और फैलती दिखाई दे रही हैं। जाति और धर्म के आधार पर समाज को विभाजित करने वालों के प्रति कवि क्षुब्ध दिखाई देते हैं। वे सभ्य समाज के लिए मानवतावादी धर्म को आवश्यक मानते हैं—“जात धरम के झन दे ताना/ मनखे मनखे एक समाना/ काबर सिरजित हे जग जानौ/ मानवता का हे पहिचानौ।” व्यवहार-बोध और जीवन-संदेश की ऐसी ही अभिव्यक्तियाँ ‘नामबर’, ‘जिनगी मिले उधार’, ‘मतदान’, ‘आदत अपन बनाई’, ‘जीयत भर सुख पाबे’, ‘सुग्घर रीत निभाव’ और ‘सहीं टेम मा गोड़ घांटी बंधावै’ आदि रचनाओं में भी दिखाई देती हैं।
रचनाकार को अपने प्रदेश और अपनी धरती के प्रति अटूट लगाव है। छत्तीसगढ़वासी छत्तीसगढ़ को ‘महतारी’ अर्थात् माँ का दर्जा देते हैं। कवि ‘छत्तीसगढ़ महिमा’ कविता में छत्तीसगढ़ का वात्सल्यमयी माँ के रूप में चित्रण करते हुए उसकी महिमा का गुणगान करते हैं। इस कविता में छत्तीसगढ़ से संबंधित पौराणिक कथाओं, नदियों, भौतिक संसाधनों, लोकगीतों, लोकनृत्यों, तीज-त्योहारों और ऐतिहासिक स्थलों का सुंदर चित्रण मिलता है—“राजा दशरथ के ससुरारे/ कौशल्या के मइकारो/ दक्षिण कौशल नाव पुराना/ रामलाल के महिमा यारो/ सुवा ददरिया करमा पंथी/ श्रोतन के अंतस पोहै/ राउत नाचा के दोहा हा/ काखर मन ला नइ मोहै।” इन पंक्तियों में छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक स्मृतियों, लोकविश्वासों और लोककलाओं के प्रति कवि की आत्मीयता सहज रूप में व्यक्त हुई है।
जाति-पाँति और ऊँच-नीच के भेदभाव से परे समतावादी समाज की स्थापना में संत गुरु घासीदास जी का प्रयास अन्यतम है। वे संत कबीरदास की तरह ऊँचे कुल को महत्व देने के बजाय ऊँचे कर्म को महत्व देते हैं। उत्तम चरित्र और मानवता के गुणों से विभूषित मनुष्य को ही वे श्रेष्ठ मानते हैं। गुरु घासीदास जी के संदेशों से प्रेरित कवि श्रद्धावनत होकर उनकी महिमा का बखान करते हैं। ‘सतगुरु बाबा मोर’ के अतिरिक्त अन्य छंदों में भी गुरु घासीदास जी के प्रति श्रद्धाभाव प्रकट हुआ है। यहाँ गुरु घासीदास केवल धार्मिक व्यक्तित्व के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक समता और मानवतावादी चेतना के प्रतीक के रूप में उपस्थित होते हैं।
कवि की दृष्टि समकालीन राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों पर भी है। आज लोकतंत्र के भीड़तंत्र में बदलते जाने की चिंता व्यापक है। सत्ता प्राप्त करने के लिए धनबल और बाहुबल का प्रभाव बढ़ना लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए चिंता का विषय है। ऐसी परिस्थितियों में ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ जैसी मानसिकता मजबूत होती जाती है। लोकतंत्र के भीड़तंत्र में बदलने की पीड़ा कवि की काव्य-पंक्तियों में स्पष्ट दिखाई देती है। झूठ, फरेब और पाखंड से भरे लोगों के बीच सीधे-सादे व्यक्ति की विवशता को कवि इस प्रकार व्यक्त करते हैं—“अब्बड़ ही डंडी/ घात घमंडी/ अनचित कारज/ रोज करै/ चापट चपकाके/ धोखा खाके/ सिधवा मनखे रोज मरै।” इन पंक्तियों में छल-कपट से भरे सामाजिक परिवेश में सरल और ईमानदार व्यक्ति की पीड़ा प्रभावी ढंग से व्यक्त हुई है।
‘बगरय छंद अंजोर’ कवि का पहला काव्य-संग्रह है। इसकी कहन-शैली में लक्षणा और व्यंजना की अपेक्षा अभिधा की प्रधानता दिखाई देती है। भावों का संप्रेषण प्रायः सीधे और स्पष्ट रूप में हुआ है। निश्चित रूप से कविता के लिए संवेदना पहली शर्त है, किंतु संवेदना को व्यक्त करने के लिए व्यंजनात्मक शैली कविता की मार्मिकता और प्रभावशीलता को और बढ़ा सकती है। कहन की शैली में पैनापन निरंतर अध्ययन, अनुभव और रचनात्मक परिपक्वता से आता है। यह भी सच है कि प्रत्येक रचनाकार की रचनात्मक यात्रा अभिधा से ही आगे बढ़ती है। जब शैली परिष्कृत होती है, तब तथात्मक बातें भी अधिक प्रभावशाली और बहुआयामी होने लगती हैं। इस दृष्टि से यह संग्रह कवि की रचनात्मक यात्रा का महत्वपूर्ण प्रारंभिक पड़ाव है और आगे की संभावनाओं के संकेत भी देता है।
कुल मिलाकर ‘बगरय छंद अंजोर’ केवल छंदों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ी लोकजीवन, संस्कृति, परंपरा, सामाजिक चेतना और मानवीय सरोकारों से जुड़ी काव्यात्मक अभिव्यक्ति है। 77 रचनाओं और 48 प्रकार के छंदों के माध्यम से कवि ने छंद परंपरा के प्रति अपनी गहरी प्रतिबद्धता व्यक्त की है। साथ ही उन्होंने छत्तीसगढ़ी समाज के सुख-दुख, उसकी समस्याओं, सांस्कृतिक विरासत, लोकविश्वासों और समकालीन चुनौतियों को अपनी कविता का विषय बनाया है। यह संग्रह छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य के संरक्षण तथा छत्तीसगढ़ी संस्कृति के संवर्धन की दिशा में एक सार्थक प्रयास कहा जा सकता है। छत्तीसगढ़िया संस्कृति की सुगंध से सुवासित, लोकजीवन की मिट्टी से जुड़ी और छंदों के अनुशासन में ढली यह कृति निश्चय ही छत्तीसगढ़ के जनमानस को प्रभावित और प्रेरित करेगी—ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए।
कृति — बगरय छंद अंजोर (छत्तीसगढ़ी कविता संग्रह)
कवि — सुखदेव सिंह अहिलेश्वर
प्रकाशक — छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग
समीक्षक -- नरेंद्र कुमार कुलमित्र
कवर्धा, छत्तीसगढ़