Tuesday, 18 August 2026

‘नीलमणि’ : विज्ञान, अध्यात्म, प्रेम, प्रकृति और अंतर्द्वंद्व की कविताएँ 26.03.23

‘नीलमणि’ : विज्ञान, अध्यात्म, प्रेम, प्रकृति और अंतर्द्वंद्व की कविताएँ
‘नीलमणि’ नीरज मनजीत का तीसरा काव्य-संग्रह है। इससे पहले उनके दो काव्य-संग्रह—‘कविता खिलती है’ एवं ‘ग्लेशियर’—प्रकाशित हो चुके हैं। इस संग्रह में कुल 100 कविताएँ संकलित हैं, जिन्हें पाँच भागों में विभाजित किया गया है। पहला भाग ‘अध्यात्म और प्रेम’, दूसरा ‘विज्ञान और प्रेम’, तीसरा ‘प्रेम और प्रकृति’, चौथा ‘अंतर्द्वंद्व और कोविड काल में कविता’ तथा पाँचवाँ ‘कुछ और कविताएँ’ है। इन पाँचों भागों में क्रमशः 18, 17, 35, 18 और 12 कविताएँ संकलित हैं। संग्रह के तीसरे भाग ‘प्रेम और प्रकृति’ में सर्वाधिक 35 कविताएँ हैं।
कविता-संग्रह की अधिकांश कविताएँ प्रेम से आप्लावित हैं। संग्रह के प्रारंभिक तीन भागों के शीर्षकों में ‘प्रेम’ शब्द का प्रयोग हुआ है। सच भी है कि अध्यात्म, विज्ञान और प्रकृति प्रेम के बिना अधूरे हैं। तीनों की सार्थकता उनमें निहित प्रेम से ही है। प्रेम जीवन का अनिवार्य अंग है। बिना प्रेम के जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। अथवा यूँ कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी कि जीवन है तो प्रेम है और प्रेम है तो जीवन है।
इस काव्य-संग्रह की अधिकांश कविताएँ विज्ञान-प्रेरित हैं। कवि अध्यात्म, प्रेम, प्रकृति और हमारे भीतर चल रहे अंतर्द्वंद्व को विज्ञान से जोड़ते हैं। आज हमारा पूरा जीवन और पूरा परिवेश विज्ञानमय है। वैज्ञानिक शोधों और आविष्कारों का हमारे जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा है। ऐसे में वैज्ञानिक सोच रखने वाला दूरदृष्टा कवि भला विज्ञान से कैसे अछूता रह सकता है। इस संग्रह की अधिकांश कविताओं में वैज्ञानिक शब्दावलियों की भरमार दिखाई देती है। उनकी कविताओं में गैलेक्सी, ब्लैक होल, ब्रह्मांड, सूर्य, चंद्रमा, नक्षत्र, क्वांटम भौतिकी, आइंस्टाइन, सापेक्षता का सिद्धांत, स्ट्रिंग पार्टिकल, ग्रेविटेशनल पार्टिकल, हिग्स बोसोन, आकाशगंगा, अंतरिक्ष, डार्क मैटर, यूनिवर्स, प्लेनेट, गुरुत्वाकर्षण, कॉस्मिक सिविलाइजेशन, स्पेस, कॉस्मिक आवरण, तारामंडल, एलियन, ग्रह, निर्वात, प्रकाशवर्ष, इवोल्यूशन, निहारिका, सितारे, इवेंट होराइजन जैसे शब्दों का प्रयोग स्वाभाविक रूप से हुआ है। प्रकृति और अंतरिक्ष की दुनिया जितनी रहस्यों से भरी हुई है, उतना ही रहस्यमय प्रेम है और उतनी ही रहस्यमय मानवीय व्यवहार की दुनिया भी। कवि समस्त मानवीय व्यवहारों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखते हैं। हम कह सकते हैं कि उनकी कविताओं में गहरा विज्ञान है या फिर पूरा विज्ञान ही कविताओं में ढल गया है। इस संग्रह में ऐसी बहुत-सी कविताएँ हैं, जिनमें वैज्ञानिक परिकल्पना कवि-कल्पना में समाहित हो गई है। ‘किसी दिन’ कविता में ऐसे नए आयाम की परिकल्पना की गई है, जहाँ हमारी गति, हमारा दिमाग, यहाँ तक कि चौपायों की दुनिया भी आमूलचूल रूप से बदलकर एक नई और विस्तारित दुनिया का रूप ले लेगी।
15वीं-16वीं शताब्दी में अंधधार्मिकता का एक दौर था। एक बार फिर 21वीं सदी के इस दौर में हम उसी अंधधार्मिकता को अपनी आँखों से देख रहे हैं। जिस अंधधार्मिकता का विरोध कबीर ने किया था, बिल्कुल वैसे ही कर्मकांडों, धार्मिक उत्सवों एवं जुलूसों का दौर फिर शुरू हो गया है। पीड़ित-शोषित जनों की सेवा को नारायण-सेवा माना जाता है, मगर आज की अंधधार्मिकता ने नर-सेवा को दरकिनार कर दिया है। कवि की पहली कविता ‘क्षमा करना देव’ में ‘नर-सेवा ही नारायण-सेवा है’ का भाव प्रस्फुटित हुआ है—“.....रक्तरंजित उस युवक को/औषधालय तक ले जाने में ही/लगा रहा देव/आतंकियों ने जिसे/संगीनों से बींध दिया था/मुझे क्षमा करना/तुम्हारी जय करते/भक्तों के जुलूस के साथ/मैं तुम तक नहीं पहुँच सका......”
‘राग आशा’ शीर्षक की कविता जीवन में आशा का नया राग उत्पन्न करने वाली कविता है। दरअसल, इस दुनिया में अंधकार और निराशा जैसी कोई बात ही नहीं होती। उजाले का न होना अंधकार है और आशा का न होना ही निराशा है। कुदरती चीजों को देखकर हमारे भीतर आशा का संचार होता है—“......पौधों पर खिलते फूल/वृक्षों पर पकते फल/पक्षियों की उड़ान/नदी का प्रवाह/तितली का उड़ना/भ्रमर का गुंजन/बच्चे की किलकारी/माँ का ममत्व/आशा के स्रोत ही तो हैं.....”
प्रत्येक व्यक्ति के भीतर एक आग होती है। भीतर की आग असीम सामर्थ्य और शक्ति की प्रतीक होती है। दरअसल, यही भीतर की आग है, जो किसी भी असंभव कार्य को संभव बनाने की क्षमता रखती है। यदि हम इस आग का प्रयोग न करें तो समय के साथ वह ठंडी पड़ जाती है। कवि की ‘अग्नि जिव्हा’ कविता हमें अपने भीतर की आग का प्रयोग करने के लिए प्रेरित करती है—“....इसके पहले कि तुम्हारे भीतर/आग ठंडी पड़ जाए/उसे बाहर ले आओ/और उसे वहाँ भी ले जाओ/जहाँ आग की जरूरत है!....”
केवल जय और पराजय के भाव से जीने में जिंदगी, जिंदगी नहीं रह जाती, बल्कि प्रतिस्पर्धा बन जाती है। सतत प्रवाहमान नदी हमें जय-पराजय के भाव से परे होकर जीना सिखाती है—“....विजयी नहीं होती नदी/पराजित नहीं होती/केवल प्रवाहित होती है नदी।...”
जीवन, मृत्यु और उसके रहस्य को लेकर लेखकों, कवियों और दार्शनिकों में चिंतन होता रहा है। वैज्ञानिक यह मानने लगे हैं कि इस संसार से परे अनेक संसार और अनेक ब्रह्मांड भी हो सकते हैं। पुराना ब्रह्मांड ब्लैक होल में समा जाता है और फिर एक नया ब्रह्मांड आकार लेता है। इसी तरह हमारे जीवन का अनिवार्य सत्य मृत्यु भी नए जीवन का द्वार हो सकती है। हमें मृत्यु को सहज और सकारात्मक रूप में स्वीकार करना चाहिए। कवि की ‘नई जिंदगी’ कविता इसी बात की तस्दीक करती है—“.....संभवतः हर ब्लैक होल/प्रकृति का सर्वाधिक खतरनाक द्वार है/दूसरे किसी ब्रह्मांड में जाने का/जिस तरह मृत्यु एक द्वार है/नई जिंदगी के लिए!.....”
हम देखते हैं कि तथाकथित प्रबुद्धजन वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था के गिरते स्तर पर तंज कसते रहते हैं। जाति-धर्म, ऊँच-नीच का भेदभाव फैलाने वाले राजनीतिज्ञों को कोसते हैं। मगर स्वयं को समदृष्टि-संपन्न मानने वाले तथाकथित प्रबुद्धजन भी वामपंथ और दक्षिणपंथ में बँटे हुए हैं। अगर यह धरती सियासतदानों से संभल नहीं रही है, तो तथाकथित प्रबुद्धजनों में भी यह कुव्वत कहाँ है? कवि ने अपनी कविता ‘अनुत्तरित’ में तथाकथित प्रबुद्धजनों पर तीखा प्रहार किया है।
जिस तरह हमारे जीवन में खट्टे-मीठे पल आते हैं, वैसे ही कविताओं में शब्द आते हैं। कविताओं के शब्द चुभते हैं तो सहलाते भी हैं। फूल खिलता है और अपने सौंदर्य से हमें आनंदित कर देता है, पर फूल के खिलने और कविता के खिलने में अंतर है। फूल किसी खास मौसम में खिलता है, कविता हर मौसम में खिलती है। फूलों का सौंदर्य और महक सीमित है, जबकि कविता का सौंदर्य और उसकी महक असीमित है। कविता एक बार खिलती है और फिर सदा-सदा के लिए खिली रहती है। ‘कविता खिलती है’ कविता में कविता के महत्त्व को बिंबात्मक रूप में चित्रित किया गया है।
फेसबुक, व्हाट्सऐप और तमाम तरह के सोशल मीडिया की गिरफ्त में हमारी नई पीढ़ी किताबों से दूर होती जा रही है। इधर लोगों में किताबें पढ़ने की रुचि घटती जा रही है। रुचि घटने के साथ-साथ लोग इतने व्यस्त हो गए हैं कि वे किताबें पढ़ने के लिए वक्त नहीं निकाल पाते। उपभोक्तावाद, बाजारवाद और वैश्वीकरण ने लोगों की पढ़ने की आदत को प्रभावित किया है। हम भौतिकता के दबाव से उबर नहीं पा रहे हैं। किताबें पढ़ना और बौद्धिक-मानसिक संतुष्टि प्राप्त करना पिछड़ेपन की निशानी समझी जा रही है। ऐसे हालात में किताबों की दुनिया को सुरक्षित रखना तथा नई पीढ़ी में किताबें पढ़ने का संस्कार डालना बेहद जरूरी हो गया है। ‘किताबें’ कविता किताबों को लेकर उम्मीद बँधाती है। कवि आशावान हैं। वे लिखते हैं—“....तब भी किताबें/हमारे पास होंगी।...”
संग्रह के तीसरे खंड में ‘प्रेम और प्रकृति’ की कविताएँ संग्रहीत हैं। काव्य-संग्रह का नाम ‘नीलमणि’ कविता पर रखा गया है। यह इस खंड की पहली कविता है। ‘नीलमणि’ प्रकृति की कविता है, जिसमें दृश्य-बिंबों एवं रूपकों का सुंदर प्रयोग किया गया है। समुद्र प्रकृति के अंतर्मन का रूपक है। मगर मन की गहराई समुद्र की गहराई से कहीं अधिक होती है। कवि लिखते हैं—“.....एक अंतर्मन में डूबे/कई-कई मन..।” प्रकृति सचमुच रहस्यमयी होती है। अपना रहस्य स्वयं प्रकृति ही जानती है। प्रकृति का रहस्य समझने की क्षमता किसी में नहीं है, मगर एक सच्चा कवि प्रकृति के सौंदर्य में डूबकर उसका आनंद ले सकता है—“तुम किसी और को जानने देना नहीं चाहती/केवल मैं ही तो डूब पाता हूँ/इन पर्वतों, इन घाटियों में!”
कवि में गहरा पर्यावरणीय बोध है। खूबसूरत हरी-भरी धरती से पेड़ दिन-ब-दिन कम होते जा रहे हैं। पेड़, प्रकृति और धरती की चिंता कवि की चिंता में समाहित है। ‘वृक्ष-विहीन’ कविता में वे कहते हैं—“......क्या ही अच्छा होता कि/प्रकृति ने/वृक्षों को पाँव दे दिए होते/कम से कम वे/उस इलाके से/भाग तो खड़े होते/जहाँ बिजली की आरियाँ लिए लोग/उन्हें क़त्ल करने/आमादा रहते हैं।”
कवि अपनी कल्पना के सहारे कभी विगत की बात करते हैं तो कभी आगत की, किंतु वे अपने परिवेश और वर्तमान को कभी नहीं भूलते। वे अपनी युगीन परिस्थितियों के केवल मूकदर्शक नहीं होते, बल्कि उन्हें रचते भी हैं। कोविड काल की विषम परिस्थितियों को ‘सुरंग’ कविता में अभिव्यक्त करते हुए कवि लिखते हैं—“......माना कि अंधकार गहन है/रात भारी और/सुरंग लंबी है/पर डरो मत/धीरे-धीरे आगे बढ़ते चलो/मुहाने की ओर/तुम देखोगे कि/रोशन हो रही है सुरंग/और खुली दुनिया की ओर जाने वाला रास्ता/खुल रहा है.....।” ऐसे ही कवि अपने समय के विरोधाभास पर कविता की भाषा में टिप्पणी करते हैं। युद्ध से कभी शांति स्थापित नहीं हो सकती, मगर—“....अमन के वास्ते/जंगें जारी हैं....”
कवि की अधिकांश कविताओं में प्रयोगवादी कवियों की तरह नवीन कल्पना, नवीन भाव-उद्भावना और नवीन शिल्प-प्रयोग देखने को मिलते हैं। ‘पियानो के की-बोर्ड पर उतरते शब्द’ कविता में बिंबों की छटा अद्भुत है—“....रिमझिम बारिश के टुकड़े/तितलियों के कुछ रंगीन उड़ते पंख/गेंदे की कुछ केसरिया-पीली पंखुड़ियाँ/मीठे नीम की कुछ हरी पत्तियाँ/सलेटी रात की कुछ रेशमी कतरनें/तारों की नदी से छलकती कुछ चमकीली नीली बूँदें/पूर्णमासी के चंद्रमा से गिरती कुछ रजत डोरियाँ....।”
नवीन शब्दों का प्रयोग करने में कवि इतने माहिर हैं कि कोई भी सुधी पाठक उनके शब्दों की नवीनता, उनकी महीन बुनावट और यथोचित प्रयोग से चमत्कृत हुए बिना नहीं रह सकता। ‘गुमसुम-सी शाम’, ‘आह्लादक पुलक नर्तन’, ‘निस्सीम निर्विकल्प नीलगगन’, ‘उद्दाम आँधियाँ’ जैसे विशेषणात्मक शब्दों का प्रयोग करने में कवि सिद्धहस्त हैं।
रंगों का हमारे जीवन पर गहरा प्रभाव होता है। प्रकृति इतनी खूबसूरत इसीलिए लगती है, क्योंकि वह रंग-बिरंगी है। संग्रह की कविताओं को पढ़ने से पता चलता है कि कवि को रंगों से विशेष लगाव है। वे अपनी कविताओं में रंगों का प्रयोग बार-बार करते हैं। सफेद, नीला, हरा, काला, लाल, गेरुआ, सलेटी आदि रंगों का प्रयोग विशेष तौर पर किया गया है। प्रकृति-चित्रण की कविताओं में सलेटी रंग का प्रयोग सबसे अधिक बार हुआ है।
कवि बड़ी ही महीन दृष्टि से प्रकृति-चित्रण करते हैं। उनके प्रकृति-चित्रण में प्रकृति के सारे उपादान अनायास आ जाते हैं। उनकी कविताओं में धरती, अंतरिक्ष और समुद्र का सौंदर्य-चित्रण देखते ही बनता है। उनमें नदी, पहाड़, झरना जैसे अनेक दृश्यों को बिंबात्मक रूप में शब्दों में बाँधने की अद्भुत क्षमता है। उनके दृश्य-चित्रण में पूरा परिदृश्य पाठक के मानस-पटल पर प्रत्यक्ष हो जाता है। कवि दृश्य-बिंब का प्रयोग करने में पारंगत हैं। शब्दों के माध्यम से किसी भी दृश्य को जीवंत और साकार कर देने में कवि दक्ष हैं। उनकी अधिकांश कविताओं में दृश्य-बिंब का प्रयोग देखा जा सकता है। ‘अरुणोदय’ कविता में प्रातःकालीन बेला का अत्यंत आकर्षक चित्र खींचा गया है। इस कविता को पढ़ने से शमशेर बहादुर सिंह की ‘उषा’ कविता अनायास याद आ जाती है—“क्षितिज तक/नीला जल/अरुणोदय की/पीली, गुलाबी, सुनहली सूर्य-किरणों से/चमचमाता—/सृष्टि की/नीली आँखों में/प्रसन्नता की चमक/पलकें बंद मत करना/टूटे न कहीं/ये करिश्मा....।”
कवि रूपकों का प्रयोग करने में भी माहिर हैं। ‘रेशमा’ कविता में रेशमा नाम की लड़की के चित्रांकन में सुंदर रूपकों का प्रयोग किया गया है। ओस की एक बूँद, पीले पंखों वाली तितली, चंद्रकिरण, एक प्रेम-कविता, एक फाख्ता जैसे रूपकों के प्रयोग से रेशमा की मुखाकृति दृश्य-बिंब के सहारे साकार हो उठती है। कवि घूमने-फिरने के शौकीन रहे हैं। वे देश-विदेश के अनेक साहित्यिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेते रहे हैं। उन्होंने फ्रांस, बेल्जियम, जर्मनी, ऑस्ट्रिया, स्विट्जरलैंड, इटली, वेटिकन सिटी, हांगकांग, मकाऊ आदि देशों की साहित्यिक यात्राएँ की हैं। एक चेतस रचनाकार अपनी यात्रा के अनुभवों से अप्रभावित नहीं रह सकता। इस काव्य-संग्रह में ऐसी कई कविताएँ हैं, जिनकी पृष्ठभूमि उनकी विदेश-यात्राओं पर आधारित है। ‘काँच का समुद्र’ एक ऐसी ही कविता है, जिसे कवि ने अपनी मॉरीशस यात्रा के दौरान पारदर्शी समुद्र की खूबसूरती से प्रभावित होकर लिखा था। कविता में रूपक और दृश्य-बिंब का प्रयोग देखते ही बनता है—“समुद्र में पानी नहीं था/प्रकृति ने/नीला-हरा शीशा पिघलाकर/समुद्र में डाल दिया था/पहली बार देखा/काँच का समुद्र!”
इस तरह उनकी कविताओं में गहरा जीवन-राग, अस्मिता-बोध, ज्ञान-विज्ञान, धर्म, अध्यात्म, प्रकृति, प्रेम एवं मानवीय संबंधों से उपजे अंतर्द्वंद्व व्याप्त हैं। रचनाकारों में वैयक्तिक भिन्नता के साथ-साथ रचनात्मक एवं शैलीगत भिन्नता भी देखी जाती है। मनजीत जी की कविताओं में कहन की जो शैली है, वह अपनी विशिष्टता के कारण आसानी से पहचानी जा सकती है। वैश्वीकरण के इस दौर में भाषाई उदारीकरण कवि की कविताओं में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। कवि अपनी कविताओं में जहाँ एक ओर संस्कृतनिष्ठ तत्सम शब्दों का प्रयोग करते हैं, वहीं दूसरी ओर उर्दू और अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग करने से भी नहीं हिचकते। भाषाई लचीलेपन के कारण ही उनकी कविताओं से भावबोध एवं सौंदर्यबोध सहजतापूर्वक ग्राह्य होता है। मेरा विश्वास है कि भाव-प्रेमी एवं सौंदर्य-प्रेमी पाठकों को उनकी कविताएँ निःसंदेह प्रभावित करेंगी।

कृति — ‘नीलमणि’ (कविता-संग्रह)
कवि — नीरज मनजीत
प्रकाशक — इंडिया नेट बुक्स प्राइवेट लिमिटेड, दिल्ली

समीक्षक -- नरेंद्र कुमार कुलमित्र
कवर्धा, छत्तीसगढ़
मो. 9755852479

No comments:

Post a Comment