ऐसा मुझसे कभी नहीं होता
कि कोई मुझसे अप्रसन्न रहे और मैं खुश रहूँ।
किसी की अप्रसन्नता का कारण बनकर
बुरी तरह विचलित हो जाता हूँ।
मुझे बिल्कुल भी सामान्य नहीं रहने देता
मेरे मन में उपजा आत्मग्लानि का भाव।
खुद को धिक्कारता हूँ बार-बार,
कहता हूँ—क्षमा माँग लो;
पर रोड़े की तरह मेरा अहं
बीच रास्ते में खड़ा हो जाता है।
पर मेरे प्रेम की ऊष्मा से न पिघल सके,
इतना कठोर कभी नहीं रहा मेरा अहं।
अहं का टूटना...
फिर क्षमा माँगना...
और प्रेम में डूब जाना...
मोक्ष की प्राप्ति-सा लगता है।
-- नरेंद्र कुमार कुलमित्र
9755852479
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