युवा उपन्यासकार किशन लाल का उपन्यास ‘चीटियों की वापसी’ एक वर्ष पूर्व पढ़ा था। पढ़ते समय उपन्यास से जुड़े कुछ विचार और टिप्पणियाँ मैंने अलग-अलग नोट्स के रूप में दर्ज की थीं। उन बिखरी हुई टिप्पणियों को अब एक क्रम में रखने की कोशिश कर रहा हूँ।
‘चीटियों की वापसी’—यानी यह शहर रहने लायक नहीं! शीर्षक के साथ सामने आने वाला यह उपन्यास वस्तुतः छत्तीसगढ़ का एक ऐसा आईना है, जिसमें पाठक प्रदेश की अनेक मूलभूत समस्याओं, सामाजिक अंतर्विरोधों और जीवन की विडंबनाओं को साफ-साफ देख सकता है। उपन्यास में शहरी जीवन की विसंगतियाँ, विकृतियाँ और आडंबर जिस तरह उभरकर सामने आते हैं, वे पाठक को सहज ही अपने आसपास की दुनिया से जोड़ देते हैं।
उपन्यास के केंद्र में तीन चीटियाँ हैं। मानवीय पात्रों में गुरुजी, संजय, मधुलिका, अंबा, सुनील, संतन दास, सुखचैन, भागवत दास, ज्ञानदास, गौरी और दूरपति आदि प्रमुख हैं। किशन लाल का यह उपन्यास मुख्यतः दलित चिंतन पर केंद्रित दिखाई देता है, लेकिन इसके समानांतर छत्तीसगढ़ की अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय समस्याएँ तथा चिंताएँ भी अंतर्निहित हैं। दलित विमर्श के साथ स्त्री विमर्श, पर्यावरण विमर्श, आदिवासी विमर्श, सामाजिक विमर्श और धार्मिक विमर्श भी उपन्यास की कथा में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं।
इस उपन्यास की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि कथा और उसकी चिंताएँ मूलतः मानवीय दुनिया से संबंधित हैं, लेकिन कथा का निर्वाह चीटियों को पात्र बनाकर किया गया है। पशु-पक्षियों और जीव-जंतुओं के माध्यम से मानवीय समाज की कथा कहने की यह परंपरा भारतीय साहित्य में पुरानी है। जातक कथाओं, हितोपदेश और आचार्य विष्णु शर्मा की पंचतंत्र की कथाओं में इसके उदाहरण मिलते हैं। किशन लाल इसी परंपरा को समकालीन सामाजिक यथार्थ के साथ जोड़ते हैं। कथा भले ही चीटियों और दूसरे जीव-जंतुओं के बीच चलती हो, लेकिन उनके संवादों में मनुष्य की दुनिया का कटु यथार्थ पूरी तीव्रता के साथ उजागर होता है।
उपन्यास की कथा का आरंभ छत्तीसगढ़ राज्य के निर्माण और रायपुर को राजधानी बनाए जाने के प्रसंग से होता है। राजधानी के विकास और विस्तार के लिए रायपुर के आसपास के अनेक गाँवों के विस्थापन की पीड़ा को उपन्यासकार ने अपनी कथा का आधार बनाया है। विकास की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि उसका लाभ प्रायः शक्तिशाली और संपन्न वर्ग को मिलता है, जबकि उसकी कीमत मध्यवर्ग, निम्नवर्ग और प्रकृति को चुकानी पड़ती है। विस्थापन का दर्द धनिक वर्ग तक बहुत कम पहुँचता है; उसका वास्तविक भार उन लोगों को उठाना पड़ता है जिनकी जमीन, घर और जीवन ही उनके अस्तित्व का आधार हैं।
विकास के नाम पर होने वाला विस्थापन केवल मनुष्य की दुनिया को ही प्रभावित नहीं करता, बल्कि पशु-पक्षियों, जीव-जंतुओं और कीड़े-मकोड़ों की बसी-बसाई दुनिया भी उजड़ जाती है। मनुष्य किसी तरह विस्थापित होकर पुनर्वासित हो सकता है और धीरे-धीरे नए परिवेश के अनुकूल हो सकता है, लेकिन निरीह जीव-जंतुओं के लिए उनका उजड़ना एक पूरी दुनिया के समाप्त हो जाने जैसा है। उपन्यास में खेतों में रहने वाली चीटियों का विस्थापित होकर शहर में पहुँचना इसी विडंबना का मार्मिक रूपक बन जाता है।
गाँव की स्वच्छ, सुंदर और अपेक्षाकृत प्रदूषण रहित आबोहवा में रहने वाली चीटियाँ जब शहर पहुँचती हैं तो उन्हें बदबू, प्रदूषण और कृत्रिम जीवन से दो-चार होना पड़ता है। चीटियों के संवादों के माध्यम से ग्रामीण और शहरी पर्यावरण की तुलना की गई है। इस तुलना में केवल दो भौगोलिक परिवेशों का अंतर नहीं है, बल्कि आधुनिक विकास मॉडल पर भी गंभीर प्रश्न खड़े किए गए हैं। चीटियों की बातचीत धीरे-धीरे मानव समाज की पोल खोलती जाती है और पाठक को यह सोचने के लिए विवश करती है कि विकास आखिर किसके लिए और किस कीमत पर हो रहा है।
उपन्यास में दलितों की समस्याओं, विशेषकर छत्तीसगढ़ के सतनामी समुदाय के सामाजिक जीवन, उसकी अच्छाइयों और अंतर्विरोधों को भी सामने लाया गया है। संजय, गुरुजी और सुखचैन के बीच होने वाली बहसों में संविधान की वास्तविकता, आदिवासियों की समस्याएँ, नक्सली समस्या और उनके पीछे की जमीनी परिस्थितियों पर गंभीर विचार दिखाई देता है। यहाँ उपन्यासकार किसी सतही निष्कर्ष पर पहुँचने के बजाय उन जटिल परिस्थितियों की ओर संकेत करता है, जिनसे समाज लगातार जूझ रहा है।
गुरुजी और पत्रकार संजय के संवादों में सरकारों के कथित धर्मनिरपेक्ष और संवैधानिक चरित्र तथा उनके व्यवहार के बीच दिखाई देने वाले अंतर पर भी प्रश्न उठता है। राजिम मेले को कुंभ का दर्जा दिए जाने और उसके लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जाने की तुलना में सतनामियों के प्रमुख तीर्थस्थल गिरौधपुरी के विकास की उपेक्षा का प्रसंग धार्मिक और राजनीतिक प्राथमिकताओं पर सवाल खड़ा करता है। यह प्रसंग इस बात की ओर संकेत करता है कि लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था में भी यदि किसी समुदाय के साथ असमान व्यवहार दिखाई दे, तो उस पर प्रश्न उठाना आवश्यक है।
उपन्यास की भाषा उसकी कथा और पात्रों के अनुरूप है। प्रसंगानुकूल भाषा इसका एक महत्वपूर्ण गुण है। जहाँ पात्रों के भीतर गुस्सा, खीझ, आक्रोश या असहमति है, वहाँ ठेठ छत्तीसगढ़ी और प्रचलित बोलचाल के शब्दों तथा गालियों का प्रयोग भी स्वाभाविक ढंग से हुआ है। वहीं जब चीटियाँ गाँव की आबोहवा, प्रकृति और उसकी खूबसूरती का वर्णन करती हैं, तो भाषा अत्यंत कोमल और कहीं-कहीं काव्यात्मक हो जाती है। भाषा का यह उतार-चढ़ाव उपन्यास के वातावरण को जीवंत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
उपन्यास में चीटियाँ सर्वहारा वर्ग का प्रतिनिधित्व करती हैं। उनके भीतर किसान, मजदूर, दलित और तमाम शोषित वर्गों की सामूहिक छवि देखी जा सकती है। इस वर्ग के पास पर्याप्त धन और भौतिक संसाधन भले ही न हों, लेकिन सामुदायिक एकता, पारस्परिक प्रेम, भाईचारा और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की क्षमता प्रबल है। चीटियाँ छोटी हैं, कमजोर दिखाई देती हैं, लेकिन उनकी सामूहिक शक्ति अपार है। यही सामूहिकता उन्हें सत्ता की जड़ों को हिला देने की क्षमता प्रदान करती है। इस अर्थ में चीटियाँ केवल उपन्यास के पात्र नहीं रह जातीं, बल्कि वे एक बड़े सामाजिक रूपक में बदल जाती हैं।
उपन्यास में आद्यंत छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक और सामाजिक झलक दिखाई देती है। यहाँ छत्तीसगढ़ी जनजीवन के प्रति आत्मीयता भी है और उसकी विसंगतियों पर तंज भी। प्रदेश के लोगों और व्यवस्था के संचालकों की कमियों को लेखक ने बिना किसी लाग-लपेट के कथा के विभिन्न प्रसंगों में उजागर किया है। छत्तीसगढ़ में शराब की लत के कारण परिवारों के उजड़ने की समस्या को दूरपति के पति शिव और सुशीला के पति रामदास जैसे पात्रों के माध्यम से प्रभावशाली ढंग से सामने लाया गया है।
इस उपन्यास का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि लेखक जातिवाद और संप्रदायवाद से मुक्त ऐसे समाज की कल्पना करता दिखाई देता है, जिसमें समानता, सामूहिकता और सामाजिक न्याय को केंद्रीय स्थान प्राप्त हो। चीटियों का समुदाय इसी सामूहिक और समतामूलक समाज का एक रूपक बनकर सामने आता है। उनके जीवन में व्यक्तिगत स्वार्थ से अधिक सामुदायिक हित महत्वपूर्ण है। इस दृष्टि से उपन्यासकार की वैचारिक आकांक्षा स्पष्ट दिखाई देती है।
‘चीटियों की वापसी’ थोथे आदर्शों के बरक्स कटु यथार्थ का उपन्यास है। यह पाठक को किसी काल्पनिक और आदर्श दुनिया में ले जाने के बजाय उसके अपने आसपास की दुनिया से सामना कराता है। विकास, विस्थापन, जाति, धर्म, पर्यावरण, आदिवासी जीवन, दलित प्रश्न, स्त्री की स्थिति, शराब जैसी सामाजिक बुराइयाँ और सत्ता-व्यवस्था के अंतर्विरोध—इन सबको उपन्यास अपनी कथा में समेटता है।
किशन लाल की सफलता इस बात में है कि उन्होंने गंभीर सामाजिक प्रश्नों को सीधे उपदेश के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय चीटियों की दुनिया के माध्यम से मनुष्य की दुनिया को देखने का अवसर दिया है। चीटियाँ लौटती हैं, लेकिन उनके साथ केवल एक कथा नहीं लौटती; लौटता है वह सवाल कि क्या हमारा विकास सचमुच हमें रहने योग्य दुनिया दे रहा है?
यही प्रश्न इस उपन्यास को समकालीन छत्तीसगढ़ के सामाजिक यथार्थ का एक महत्वपूर्ण आख्यान बनाता है। ‘चीटियों की वापसी’ पढ़ते हुए पाठक अंततः चीटियों की नहीं, बल्कि अपने समाज और अपने समय की वापसी की प्रतीक्षा करता हुआ दिखाई देता है।
— नरेंद्र कुमार कुलमित्र
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