जैसे हो, वैसा रहना सीख,
दिल में है जो, उसे कहना सीख।
सुखों में तो सब जी लेते हैं,
दुखों को भी सहना सीख।
ताउम्र साथ नहीं देता कोई,
अकेले में भी रहना सीख।
ठीक नहीं है यूँ थम जाना,
नदी की तरह बहना सीख।
कहीं, कभी अनुचित लगे,
उसे दो टूक कहना सीख।
— नरेंद्र कुमार कुलमित्र
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