स्कूल परिसर के ठीक सामने,
बरगद की छांव तले,
बेहद मैली सूती साड़ी पहने,
मुर्रा, ज्वार, जोंधरी के लड्डू
और इमली, बिही (अमरूद), बेर जैसे मौसमी फल बेचती...
वह लोकन बुढ़िया,
आज भी याद है मुझे।
उस अकेली बुढ़िया को
हम स्कूल के सभी बच्चे जानते थे,
पर आश्चर्य तो यह था कि
उस बुढ़िया की धुंधली आंखें भी
हम सबको पहचानती थीं,
उसकी स्मृति में हम सबका नाम बसा था।
हमारे पांच-दस पैसों की ख़रीद से
उसे कितना फ़ायदा होता था,
हम नहीं जानते थे;
पर वह रोज़ नियत समय पर
अपने ठीहे पर बैठी मिलती थी।
अपार स्नेह और सहानुभूति से भरी
वह लोकन बुढ़िया,
भांप लेती थी हमारे चेहरों के भाव,
पढ़ लेती थी हमारी आंखों की भाषा।
कभी हमारे पास पैसे न होने पर
वह भूल जाती थी—
अपना व्यावसायिक धर्म,
हमारी दी हुई गालियां,
और हमारा चिढ़ाना...
और यूं ही थमा देती थी खाने को लड्डू!
-- नरेंद्र कुमार कुलमित्र
24.02.23
9755852479
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