Wednesday, 19 August 2026

छत्तीसगढ़ी संस्कृति से सुवासित रचना : ‘बगरय छंद अंजोर’ 08.09.23

छत्तीसगढ़ी संस्कृति से सुवासित रचना : ‘बगरय छंद अंजोर’

‘बगरय छंद अंजोर’ छत्तीसगढ़ी जनभाषा के उदीयमान कवि सुखदेव सिंह अहिलेश्वर का सद्यः प्रकाशित छत्तीसगढ़ी काव्य-संग्रह है। इस संग्रह की सभी रचनाएँ छंदबद्ध हैं। काव्य-संग्रह में कुल 77 छंदबद्ध रचनाएँ हैं और पूरे संग्रह में 48 प्रकार के छंदों का प्रयोग हुआ है। छंदों की इतनी विविधतापूर्ण उपस्थिति यह प्रमाणित करती है कि कवि को छंदों से न केवल गहरा लगाव है, बल्कि उन्हें छंद-विधान का विशेष ज्ञान भी है। छंदबद्ध रचना करना जितना श्रमसाध्य होता है, उससे कहीं अधिक कठिन होता है छंदबद्ध इकाई में भावों और अर्थों को सुरक्षित रखते हुए अपनी बात को प्रभावी ढंग से कह पाना। निश्चित शब्द और मात्रा के अनुशासन में बँधकर अपनी पूरी बात कह देना कठोर साधना का ही प्रतिफल कहा जा सकता है। इस दृष्टि से ‘बगरय छंद अंजोर’ का महत्व और बढ़ जाता है।
हिंदी साहित्य में छंदबद्ध रचना का इतिहास अत्यंत पुराना है। हिंदी साहित्य के प्रारंभिक तीनों कालों—आदिकाल, भक्तिकाल और रीतिकाल—में मुख्यतः छंदबद्ध रचनाएँ ही हुईं। चंदबरदाई की कृति ‘पृथ्वीराज रासो’ में छंदों की इतनी विविधता दिखाई देती है कि उस ग्रंथ को छंदों का ‘अजायबघर’ कहा गया है। आधुनिक काल में भी भारतेंदु तथा द्विवेदी युग के शीर्षस्थ रचनाकारों ने हिंदी कविता में संस्कृत और हिंदी के विविध छंदों का प्रयोग किया। तोमर, पद्धरी, चौपाई, दोहा, रोला, सोरठा, उल्लाला, गीतिका, सरसी, हरिगीतिका, तांटक, वीर या आल्हा, भुजंगी, शालिनी, इंद्रवज्रा, वंशस्थ, भुजंगप्रयात, द्रुतविलंबित, तोटक, वसंततिलका, मालिनी, मंदाक्रांता, शार्दूलविक्रीडित, सवैया, रूप घनाक्षरी, कवित्त, कुंडलिया, बरवै, छप्पय, पुष्पिताग्रा, लावणी और त्रिभंगी आदि इसके प्रमुख उदाहरण हैं। छंद की इस समृद्ध परंपरा में ‘बगरय छंद अंजोर’ अपनी छंद-विविधता के कारण एक उल्लेखनीय कृति के रूप में सामने आती है।
छत्तीसगढ़ी साहित्य का प्रारंभ गाथा युग, लगभग 1000 ई. से माना जाता है। तब से लेकर आज तक छत्तीसगढ़ी साहित्य की पद्य और गद्य दोनों विधाएँ निरंतर समृद्ध होती रही हैं। छत्तीसगढ़ी साहित्य को वस्तुतः छत्तीसगढ़ी लोकसंस्कृति का आख्यान कहा जा सकता है। इसमें लोक की पीड़ा, उसके सुख-दुख, संघर्ष, उल्लास और जीवनानुभवों को सहज रूप में अनुभूत किया जा सकता है। गाथा युग से जन्मा छत्तीसगढ़ी साहित्य का छोटा-सा पौधा आज विशाल वटवृक्ष का रूप ले चुका है। छत्तीसगढ़ के लोक साहित्यकार समकालीन जीवन के विविध विषयों पर अपनी लेखनी चला रहे हैं। प्रेम-चित्रण की एकांगिकता से आगे बढ़कर विषयों की विविधता अब छत्तीसगढ़ी साहित्य की विशेषता बनती जा रही है। भाषाई लालित्य, सहजता और आत्मीयता के कारण छत्तीसगढ़ी साहित्य जनमन के बेहद करीब है। विशेष रूप से छत्तीसगढ़ी गीत और कविता अपनी गेयता एवं मधुरता के कारण सर्वाधिक लोकप्रिय हैं। ‘बगरय छंद अंजोर’ इसी समृद्ध लोकधर्मी परंपरा को आगे बढ़ाने वाली कृति है।
प्राचीन काल से ही अनेक रचनाकारों में अपनी रचना के प्रारंभ में ईश्वर या गुरु-वंदना करने की परंपरा रही है। ईश्वर या गुरु-वंदना के साथ रचनाकर्म प्रारंभ करने के पीछे अपने रचनाकर्म को निर्बाध बनाए रखने की कामना के साथ-साथ अपने इष्टदेव या गुरु के प्रति प्रेम, श्रद्धा और कृतज्ञता का भाव भी निहित रहता है। आलोच्य कृति ‘बगरय छंद अंजोर’ की पहली रचना ‘सुन के गुन’ (दोहा भजन) में रचनाकार के जीवन और रचनाकर्म का मार्ग प्रशस्त करने वाले गुरुओं तथा महापुरुषों के प्रति कृतज्ञता और प्रेरणा का भाव दिखाई देता है। कवि नानक, तुलसीदास, कबीर, रहीम, रसखान और घासीदास जैसे महापुरुषों को स्मरण करते हैं, वहीं छत्तीसगढ़ के विभूति रचनाकार कोदूराम ‘दलित’, सुंदरलाल शर्मा, श्यामलाल, भानु, विप्र, सुखलाल, कपिलनाथ, नरसिंह और मनोहर दास आदि के प्रति भी श्रद्धावनत दिखाई देते हैं—“पढ़ कवि कोदूराम ला/ पढ़ ले सुंदरलाल/ श्यामलाल के संग पढ़/ भानु विप्र शुकलाल।” इस आरंभ से ही कवि की साहित्यिक संस्कारभूमि और अपनी परंपरा के प्रति सम्मान का परिचय मिलता है।
‘बगरय छंद अंजोर’ में भावगत एवं शिल्पगत दोनों प्रकार की विविधता दिखाई देती है। कवि ने अपने समाज और परिवेश से जुड़े उन तमाम विषयों को अपनी रचनाओं में समाहित किया है, जो उनके अनुभव क्षेत्र में आए हैं। उनकी कविताओं में देशप्रेम, प्रकृति-चित्रण, छत्तीसगढ़ी संस्कृति का चित्रण, सामाजिक समस्याओं का विवेचन, मजदूर-किसान के जीवन की विसंगतियों का चित्रण तथा विभूतियों के प्रति आदरभाव प्रमुखता से दिखाई देता है। संवेदनशील रचनाकार अपनी रचना में केवल भोगे हुए यथार्थ का चित्रण नहीं करता, बल्कि अपनी दूरदर्शी सोच से बेहतर संभावनाओं को भी व्यक्त करता है। सामान्य परिस्थितियों में नीतिपरक संदेशों की पुनरावृत्ति उबाऊ लग सकती है, लेकिन जब सामाजिक समस्याओं की पुनरावृत्ति हो रही हो तो सुधारात्मक संदेशों की पुनरावृत्ति भी आवश्यक हो जाती है। कबीर, रहीम और वृंद के नीतिपरक दोहे इसी कारण हर युग में प्रासंगिक बने रहे हैं। इस कृति में भी अनेक ऐसी पंक्तियाँ हैं, जिनमें व्यवहारिक ज्ञान और सामाजिक संदेश निहित हैं—“जे घर अंगना मा रथे/ अंवरा तुलसी लीम/ जादातर आवय नहीं/ ओ घर बइद हकीम।” इसी तरह शराब की सामाजिक बुराई पर कवि कहते हैं—“टठिया लोटा बेच के/ पीयत दारु मंद/ ते मनखे के जान ले/ दिन बांचे हे चंद।” इन पंक्तियों में लोकानुभव से उपजा जीवन-बोध और सामाजिक सरोकार दोनों दिखाई देते हैं।
इस कृति में हिंदी साहित्य के भक्तिकाल की अनेक विशेषताओं को भी देखा जा सकता है। ईश्वर के प्रति आस्तिकता और श्रद्धाभाव, गुरु की महत्ता, मानवता की भावना, सामाजिक एवं धार्मिक विसंगतियों का चित्रण, समाज-सुधार की भावना तथा नैतिक संदेश जैसी विशेषताएँ संग्रह के अनेक छंदों में मिलती हैं। भक्तिकाल में जिस प्रकार धार्मिक उन्माद और अंधविश्वास समाज में व्याप्त था, उसकी अनेक विकृत छवियाँ आज भी हमारे आसपास दिखाई देती हैं। चिंता की बात यह है कि ये परिस्थितियाँ थमने के बजाय अनेक स्तरों पर बढ़ती और फैलती दिखाई दे रही हैं। जाति और धर्म के आधार पर समाज को विभाजित करने वालों के प्रति कवि क्षुब्ध दिखाई देते हैं। वे सभ्य समाज के लिए मानवतावादी धर्म को आवश्यक मानते हैं—“जात धरम के झन दे ताना/ मनखे मनखे एक समाना/ काबर सिरजित हे जग जानौ/ मानवता का हे पहिचानौ।” व्यवहार-बोध और जीवन-संदेश की ऐसी ही अभिव्यक्तियाँ ‘नामबर’, ‘जिनगी मिले उधार’, ‘मतदान’, ‘आदत अपन बनाई’, ‘जीयत भर सुख पाबे’, ‘सुग्घर रीत निभाव’ और ‘सहीं टेम मा गोड़ घांटी बंधावै’ आदि रचनाओं में भी दिखाई देती हैं।
रचनाकार को अपने प्रदेश और अपनी धरती के प्रति अटूट लगाव है। छत्तीसगढ़वासी छत्तीसगढ़ को ‘महतारी’ अर्थात् माँ का दर्जा देते हैं। कवि ‘छत्तीसगढ़ महिमा’ कविता में छत्तीसगढ़ का वात्सल्यमयी माँ के रूप में चित्रण करते हुए उसकी महिमा का गुणगान करते हैं। इस कविता में छत्तीसगढ़ से संबंधित पौराणिक कथाओं, नदियों, भौतिक संसाधनों, लोकगीतों, लोकनृत्यों, तीज-त्योहारों और ऐतिहासिक स्थलों का सुंदर चित्रण मिलता है—“राजा दशरथ के ससुरारे/ कौशल्या के मइकारो/ दक्षिण कौशल नाव पुराना/ रामलाल के महिमा यारो/ सुवा ददरिया करमा पंथी/ श्रोतन के अंतस पोहै/ राउत नाचा के दोहा हा/ काखर मन ला नइ मोहै।” इन पंक्तियों में छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक स्मृतियों, लोकविश्वासों और लोककलाओं के प्रति कवि की आत्मीयता सहज रूप में व्यक्त हुई है।
जाति-पाँति और ऊँच-नीच के भेदभाव से परे समतावादी समाज की स्थापना में संत गुरु घासीदास जी का प्रयास अन्यतम है। वे संत कबीरदास की तरह ऊँचे कुल को महत्व देने के बजाय ऊँचे कर्म को महत्व देते हैं। उत्तम चरित्र और मानवता के गुणों से विभूषित मनुष्य को ही वे श्रेष्ठ मानते हैं। गुरु घासीदास जी के संदेशों से प्रेरित कवि श्रद्धावनत होकर उनकी महिमा का बखान करते हैं। ‘सतगुरु बाबा मोर’ के अतिरिक्त अन्य छंदों में भी गुरु घासीदास जी के प्रति श्रद्धाभाव प्रकट हुआ है। यहाँ गुरु घासीदास केवल धार्मिक व्यक्तित्व के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक समता और मानवतावादी चेतना के प्रतीक के रूप में उपस्थित होते हैं।
कवि की दृष्टि समकालीन राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों पर भी है। आज लोकतंत्र के भीड़तंत्र में बदलते जाने की चिंता व्यापक है। सत्ता प्राप्त करने के लिए धनबल और बाहुबल का प्रभाव बढ़ना लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए चिंता का विषय है। ऐसी परिस्थितियों में ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ जैसी मानसिकता मजबूत होती जाती है। लोकतंत्र के भीड़तंत्र में बदलने की पीड़ा कवि की काव्य-पंक्तियों में स्पष्ट दिखाई देती है। झूठ, फरेब और पाखंड से भरे लोगों के बीच सीधे-सादे व्यक्ति की विवशता को कवि इस प्रकार व्यक्त करते हैं—“अब्बड़ ही डंडी/ घात घमंडी/ अनचित कारज/ रोज करै/ चापट चपकाके/ धोखा खाके/ सिधवा मनखे रोज मरै।” इन पंक्तियों में छल-कपट से भरे सामाजिक परिवेश में सरल और ईमानदार व्यक्ति की पीड़ा प्रभावी ढंग से व्यक्त हुई है।
‘बगरय छंद अंजोर’ कवि का पहला काव्य-संग्रह है। इसकी कहन-शैली में लक्षणा और व्यंजना की अपेक्षा अभिधा की प्रधानता दिखाई देती है। भावों का संप्रेषण प्रायः सीधे और स्पष्ट रूप में हुआ है। निश्चित रूप से कविता के लिए संवेदना पहली शर्त है, किंतु संवेदना को व्यक्त करने के लिए व्यंजनात्मक शैली कविता की मार्मिकता और प्रभावशीलता को और बढ़ा सकती है। कहन की शैली में पैनापन निरंतर अध्ययन, अनुभव और रचनात्मक परिपक्वता से आता है। यह भी सच है कि प्रत्येक रचनाकार की रचनात्मक यात्रा अभिधा से ही आगे बढ़ती है। जब शैली परिष्कृत होती है, तब तथात्मक बातें भी अधिक प्रभावशाली और बहुआयामी होने लगती हैं। इस दृष्टि से यह संग्रह कवि की रचनात्मक यात्रा का महत्वपूर्ण प्रारंभिक पड़ाव है और आगे की संभावनाओं के संकेत भी देता है।
कुल मिलाकर ‘बगरय छंद अंजोर’ केवल छंदों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ी लोकजीवन, संस्कृति, परंपरा, सामाजिक चेतना और मानवीय सरोकारों से जुड़ी काव्यात्मक अभिव्यक्ति है। 77 रचनाओं और 48 प्रकार के छंदों के माध्यम से कवि ने छंद परंपरा के प्रति अपनी गहरी प्रतिबद्धता व्यक्त की है। साथ ही उन्होंने छत्तीसगढ़ी समाज के सुख-दुख, उसकी समस्याओं, सांस्कृतिक विरासत, लोकविश्वासों और समकालीन चुनौतियों को अपनी कविता का विषय बनाया है। यह संग्रह छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य के संरक्षण तथा छत्तीसगढ़ी संस्कृति के संवर्धन की दिशा में एक सार्थक प्रयास कहा जा सकता है। छत्तीसगढ़िया संस्कृति की सुगंध से सुवासित, लोकजीवन की मिट्टी से जुड़ी और छंदों के अनुशासन में ढली यह कृति निश्चय ही छत्तीसगढ़ के जनमानस को प्रभावित और प्रेरित करेगी—ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए।

कृति — बगरय छंद अंजोर (छत्तीसगढ़ी कविता संग्रह)
कवि — सुखदेव सिंह अहिलेश्वर
प्रकाशक — छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग

समीक्षक -- नरेंद्र कुमार कुलमित्र
कवर्धा, छत्तीसगढ़

नफरत और प्रेम 07.09.23

नफ़रत
रात के सघन अंधेरे की तरह होती है,
जिसके होने से कुछ भी देखा नहीं जा सकता!

​प्रेम
दिन के उजाले की तरह होता है,
जिसके होने से सब कुछ आर-पार देखा जा सकता है!!

​– नरेंद्र कुमार कुलमित्र

चीटियों की वापसी : कटु यथार्थ का आईना 13.07.23

चीटियों की वापसी : कटु यथार्थ का आईना
युवा उपन्यासकार किशन लाल का उपन्यास ‘चीटियों की वापसी’ एक वर्ष पूर्व पढ़ा था। पढ़ते समय उपन्यास से जुड़े कुछ विचार और टिप्पणियाँ मैंने अलग-अलग नोट्स के रूप में दर्ज की थीं। उन बिखरी हुई टिप्पणियों को अब एक क्रम में रखने की कोशिश कर रहा हूँ।
‘चीटियों की वापसी’—यानी यह शहर रहने लायक नहीं! शीर्षक के साथ सामने आने वाला यह उपन्यास वस्तुतः छत्तीसगढ़ का एक ऐसा आईना है, जिसमें पाठक प्रदेश की अनेक मूलभूत समस्याओं, सामाजिक अंतर्विरोधों और जीवन की विडंबनाओं को साफ-साफ देख सकता है। उपन्यास में शहरी जीवन की विसंगतियाँ, विकृतियाँ और आडंबर जिस तरह उभरकर सामने आते हैं, वे पाठक को सहज ही अपने आसपास की दुनिया से जोड़ देते हैं।
उपन्यास के केंद्र में तीन चीटियाँ हैं। मानवीय पात्रों में गुरुजी, संजय, मधुलिका, अंबा, सुनील, संतन दास, सुखचैन, भागवत दास, ज्ञानदास, गौरी और दूरपति आदि प्रमुख हैं। किशन लाल का यह उपन्यास मुख्यतः दलित चिंतन पर केंद्रित दिखाई देता है, लेकिन इसके समानांतर छत्तीसगढ़ की अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय समस्याएँ तथा चिंताएँ भी अंतर्निहित हैं। दलित विमर्श के साथ स्त्री विमर्श, पर्यावरण विमर्श, आदिवासी विमर्श, सामाजिक विमर्श और धार्मिक विमर्श भी उपन्यास की कथा में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं।
इस उपन्यास की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि कथा और उसकी चिंताएँ मूलतः मानवीय दुनिया से संबंधित हैं, लेकिन कथा का निर्वाह चीटियों को पात्र बनाकर किया गया है। पशु-पक्षियों और जीव-जंतुओं के माध्यम से मानवीय समाज की कथा कहने की यह परंपरा भारतीय साहित्य में पुरानी है। जातक कथाओं, हितोपदेश और आचार्य विष्णु शर्मा की पंचतंत्र की कथाओं में इसके उदाहरण मिलते हैं। किशन लाल इसी परंपरा को समकालीन सामाजिक यथार्थ के साथ जोड़ते हैं। कथा भले ही चीटियों और दूसरे जीव-जंतुओं के बीच चलती हो, लेकिन उनके संवादों में मनुष्य की दुनिया का कटु यथार्थ पूरी तीव्रता के साथ उजागर होता है।
उपन्यास की कथा का आरंभ छत्तीसगढ़ राज्य के निर्माण और रायपुर को राजधानी बनाए जाने के प्रसंग से होता है। राजधानी के विकास और विस्तार के लिए रायपुर के आसपास के अनेक गाँवों के विस्थापन की पीड़ा को उपन्यासकार ने अपनी कथा का आधार बनाया है। विकास की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि उसका लाभ प्रायः शक्तिशाली और संपन्न वर्ग को मिलता है, जबकि उसकी कीमत मध्यवर्ग, निम्नवर्ग और प्रकृति को चुकानी पड़ती है। विस्थापन का दर्द धनिक वर्ग तक बहुत कम पहुँचता है; उसका वास्तविक भार उन लोगों को उठाना पड़ता है जिनकी जमीन, घर और जीवन ही उनके अस्तित्व का आधार हैं।
विकास के नाम पर होने वाला विस्थापन केवल मनुष्य की दुनिया को ही प्रभावित नहीं करता, बल्कि पशु-पक्षियों, जीव-जंतुओं और कीड़े-मकोड़ों की बसी-बसाई दुनिया भी उजड़ जाती है। मनुष्य किसी तरह विस्थापित होकर पुनर्वासित हो सकता है और धीरे-धीरे नए परिवेश के अनुकूल हो सकता है, लेकिन निरीह जीव-जंतुओं के लिए उनका उजड़ना एक पूरी दुनिया के समाप्त हो जाने जैसा है। उपन्यास में खेतों में रहने वाली चीटियों का विस्थापित होकर शहर में पहुँचना इसी विडंबना का मार्मिक रूपक बन जाता है।
गाँव की स्वच्छ, सुंदर और अपेक्षाकृत प्रदूषण रहित आबोहवा में रहने वाली चीटियाँ जब शहर पहुँचती हैं तो उन्हें बदबू, प्रदूषण और कृत्रिम जीवन से दो-चार होना पड़ता है। चीटियों के संवादों के माध्यम से ग्रामीण और शहरी पर्यावरण की तुलना की गई है। इस तुलना में केवल दो भौगोलिक परिवेशों का अंतर नहीं है, बल्कि आधुनिक विकास मॉडल पर भी गंभीर प्रश्न खड़े किए गए हैं। चीटियों की बातचीत धीरे-धीरे मानव समाज की पोल खोलती जाती है और पाठक को यह सोचने के लिए विवश करती है कि विकास आखिर किसके लिए और किस कीमत पर हो रहा है।
उपन्यास में दलितों की समस्याओं, विशेषकर छत्तीसगढ़ के सतनामी समुदाय के सामाजिक जीवन, उसकी अच्छाइयों और अंतर्विरोधों को भी सामने लाया गया है। संजय, गुरुजी और सुखचैन के बीच होने वाली बहसों में संविधान की वास्तविकता, आदिवासियों की समस्याएँ, नक्सली समस्या और उनके पीछे की जमीनी परिस्थितियों पर गंभीर विचार दिखाई देता है। यहाँ उपन्यासकार किसी सतही निष्कर्ष पर पहुँचने के बजाय उन जटिल परिस्थितियों की ओर संकेत करता है, जिनसे समाज लगातार जूझ रहा है।
गुरुजी और पत्रकार संजय के संवादों में सरकारों के कथित धर्मनिरपेक्ष और संवैधानिक चरित्र तथा उनके व्यवहार के बीच दिखाई देने वाले अंतर पर भी प्रश्न उठता है। राजिम मेले को कुंभ का दर्जा दिए जाने और उसके लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जाने की तुलना में सतनामियों के प्रमुख तीर्थस्थल गिरौधपुरी के विकास की उपेक्षा का प्रसंग धार्मिक और राजनीतिक प्राथमिकताओं पर सवाल खड़ा करता है। यह प्रसंग इस बात की ओर संकेत करता है कि लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था में भी यदि किसी समुदाय के साथ असमान व्यवहार दिखाई दे, तो उस पर प्रश्न उठाना आवश्यक है।
उपन्यास की भाषा उसकी कथा और पात्रों के अनुरूप है। प्रसंगानुकूल भाषा इसका एक महत्वपूर्ण गुण है। जहाँ पात्रों के भीतर गुस्सा, खीझ, आक्रोश या असहमति है, वहाँ ठेठ छत्तीसगढ़ी और प्रचलित बोलचाल के शब्दों तथा गालियों का प्रयोग भी स्वाभाविक ढंग से हुआ है। वहीं जब चीटियाँ गाँव की आबोहवा, प्रकृति और उसकी खूबसूरती का वर्णन करती हैं, तो भाषा अत्यंत कोमल और कहीं-कहीं काव्यात्मक हो जाती है। भाषा का यह उतार-चढ़ाव उपन्यास के वातावरण को जीवंत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
उपन्यास में चीटियाँ सर्वहारा वर्ग का प्रतिनिधित्व करती हैं। उनके भीतर किसान, मजदूर, दलित और तमाम शोषित वर्गों की सामूहिक छवि देखी जा सकती है। इस वर्ग के पास पर्याप्त धन और भौतिक संसाधन भले ही न हों, लेकिन सामुदायिक एकता, पारस्परिक प्रेम, भाईचारा और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की क्षमता प्रबल है। चीटियाँ छोटी हैं, कमजोर दिखाई देती हैं, लेकिन उनकी सामूहिक शक्ति अपार है। यही सामूहिकता उन्हें सत्ता की जड़ों को हिला देने की क्षमता प्रदान करती है। इस अर्थ में चीटियाँ केवल उपन्यास के पात्र नहीं रह जातीं, बल्कि वे एक बड़े सामाजिक रूपक में बदल जाती हैं।
उपन्यास में आद्यंत छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक और सामाजिक झलक दिखाई देती है। यहाँ छत्तीसगढ़ी जनजीवन के प्रति आत्मीयता भी है और उसकी विसंगतियों पर तंज भी। प्रदेश के लोगों और व्यवस्था के संचालकों की कमियों को लेखक ने बिना किसी लाग-लपेट के कथा के विभिन्न प्रसंगों में उजागर किया है। छत्तीसगढ़ में शराब की लत के कारण परिवारों के उजड़ने की समस्या को दूरपति के पति शिव और सुशीला के पति रामदास जैसे पात्रों के माध्यम से प्रभावशाली ढंग से सामने लाया गया है।
इस उपन्यास का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि लेखक जातिवाद और संप्रदायवाद से मुक्त ऐसे समाज की कल्पना करता दिखाई देता है, जिसमें समानता, सामूहिकता और सामाजिक न्याय को केंद्रीय स्थान प्राप्त हो। चीटियों का समुदाय इसी सामूहिक और समतामूलक समाज का एक रूपक बनकर सामने आता है। उनके जीवन में व्यक्तिगत स्वार्थ से अधिक सामुदायिक हित महत्वपूर्ण है। इस दृष्टि से उपन्यासकार की वैचारिक आकांक्षा स्पष्ट दिखाई देती है।
‘चीटियों की वापसी’ थोथे आदर्शों के बरक्स कटु यथार्थ का उपन्यास है। यह पाठक को किसी काल्पनिक और आदर्श दुनिया में ले जाने के बजाय उसके अपने आसपास की दुनिया से सामना कराता है। विकास, विस्थापन, जाति, धर्म, पर्यावरण, आदिवासी जीवन, दलित प्रश्न, स्त्री की स्थिति, शराब जैसी सामाजिक बुराइयाँ और सत्ता-व्यवस्था के अंतर्विरोध—इन सबको उपन्यास अपनी कथा में समेटता है।
किशन लाल की सफलता इस बात में है कि उन्होंने गंभीर सामाजिक प्रश्नों को सीधे उपदेश के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय चीटियों की दुनिया के माध्यम से मनुष्य की दुनिया को देखने का अवसर दिया है। चीटियाँ लौटती हैं, लेकिन उनके साथ केवल एक कथा नहीं लौटती; लौटता है वह सवाल कि क्या हमारा विकास सचमुच हमें रहने योग्य दुनिया दे रहा है?
यही प्रश्न इस उपन्यास को समकालीन छत्तीसगढ़ के सामाजिक यथार्थ का एक महत्वपूर्ण आख्यान बनाता है। ‘चीटियों की वापसी’ पढ़ते हुए पाठक अंततः चीटियों की नहीं, बल्कि अपने समाज और अपने समय की वापसी की प्रतीक्षा करता हुआ दिखाई देता है।

— नरेंद्र कुमार कुलमित्र

मुसीबतें 06.07.23

मुसीबतें
अचानक आ धमकती हैं
बाढ़ की तरह हरहराकर बहा लेना चाहती हैं
संभलने का ज़रा भी मौका नहीं देतीं
हम अकबका जाते हैं
हमारे विवेक की बत्ती गुल हो जाती है
मगर बाहों को कसकर
सांसों को थामकर
पांवों को जमाकर
धैर्य बांधकर
थोड़ी देर अडिग खड़े रहने से
मुसीबतें हमसे दूर चली जाती हैं...

उदास क्षणों में 04.07.23

उदास होता हूँ
तो सोचता हूँ कि उदासी कब जाएगी?
​पर हर बार उदासी से उबरने के बाद ही
समझ पाता हूँ उदासी का महत्त्व।
​उदास क्षणों में ही
लगातार पनपते हैं
तरह-तरह के नए विचार।
​सच है, उदासी में ही विचार पकते हैं,
खरे बनते हैं।
​उमंग के क्षणों में विचार आते ही नहीं,
आते भी हैं, तो बहुत बौने होते हैं।
​बौने विचारों से व्यक्तित्व भी बौना हो जाता है,
व्यक्ति को विचारवान बनाती है उदासी...
​मैं आभारी हूँ अपने तमाम उदास क्षणों का,
जिन्होंने मुझे कसा है, पकाया है, बनाया है।
​उदासी के बाद
बिल्कुल नया हो जाता है व्यक्तित्व।
​हालाँकि मैं कभी उदास नहीं होना चाहता,
पर उदास होने पर
अपनी उदासी को कभी कोसता भी नहीं...!!

तुम रह जाना मेरे भीतर 01.07.23

तुम रह जाना मेरे भीतर—
जैसे अनगिनत शब्दों के कहे जाने पर भी
अव्यक्त रह जाती हैं बहुत-सी बातें।

​तुम रह जाना मेरे भीतर—
जैसे किसी के सशरीर चले जाने के बाद भी
मानस-पटल पर अंकित रह जाती है उसकी आकृति।

​तुम रह जाना मेरे भीतर—
जैसे असहनीय दर्द का पल गुज़र जाने पर भी
ज़ेहन में बची रह जाती है एक हल्की-सी टीस।

​तुम रह जाना मेरे भीतर—
जैसे समय के बीत जाने के बाद भी
हृदय में बनी रह जाती है अतीत की छाप।

​तुम रह जाना मेरे भीतर—
जैसे सब कुछ भूल जाने के बाद भी
स्मृतियों में शेष रह जाते हैं कुछ धुंधले से पन्ने।

​तुम रह जाना मेरे भीतर—
जैसे सारे काम निपटा लेने पर भी
अधूरे ही बचे रह जाते हैं कुछ काम।

​तुम रह जाना मेरे भीतर—
जैसे सब कुछ पा लेने के बाद भी
शेष रह जाती है कुछ और पा लेने की लालसा।

दरख़्त-सी ज़िंदगी 29.06.23

दरख़्त-सी है यह ज़िंदगी,
ख़्वाब इसके पत्ते हैं।
वक़्त के साथ पककर
पीले पड़ जाते हैं,
फिर शाख़ों से टूट जाते हैं...
​पर देखते ही देखते फिर,
बीते ख़्वाबों की तरह,
नई कोपलों से
लद जाते हैं दरख़्त।