Tuesday, 18 August 2026

तुम्हारे साथ सत्रह साल.. 06.0623

1. तुम्हारे साथ सत्रह साल.. 06.0623
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मैं टूटने लगता हूं 
तुम टूटने नहीं देती 
मैं बिखरने लगता हूं 
तुम बिखरने नहीं देती
लगता है तुम मुझे जोड़ने और संवारने ही आई हो
तुम लड़खड़ाती हो मैं..थाम लेता हूं
मैं लडखड़ाता हूं तुम संभाल लेती हो 
मेरे हिस्से का अंधेरा तुम ले लेती हो
अपने हिस्से का उजाला तुम दे देती हो
कभी तुम मुझे फटकारती हो 
कभी मैं तुम्हें फटकारता हूं
यूं एक दूसरे को फटकारने से झड़ जाती है 
हमारी जिंदगी में चिपकी हुई धूल
प्यार में हम झगड़ते हैं 
प्यार के लिए हम लड़ते हैं 
कभी निराश होकर डूब-डूब सा जाता हूं
तुम मेरी बांहें पकड़ ऊबार लेती हो
हमने साथ क्या खोया पता नहीं
पर पाया है हमने सब कुछ जो भी हमने सोचा...
तुम बस यूं संग-संग साथ चलते रहना
झगड़ना लड़ना मगर साथ रहना
हम यूं ही बढ़ेंगे आगे
नई कहानी गढ़ेंगे आगे...।

2.तुम्हें कैसे व्यक्त करूं...
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जिंदगी जो मैंने कभी परिभाषा में पढ़ी थी
तुमसे मिलने के बाद 
मैंने असल मायने में जिंदगी को जीना सिखा

कहते हैं प्रेम की गहराई में 
उथली औपचारिकताएं नहीं रह जाती
नहीं रह जाते मैं और तुम का भेद
देह और आत्मा की भाषा एकाकार हो जाती है

सुख दुख की बातें कर लेती हैं सचेतन इंद्रियां
सांसों से पता चल जाता है मन की बात
प्रेम अभिव्यक्ति के लिए निरर्थक लगते हैं सारे शब्द
प्रेम की उस गहराई में केवल अव्यक्त सचाई पलती है

तुम ही कहो प्रेम को शब्दों में कैसे कहूं
पता नहीं कितना व्यक्त कर पाऊंगा शब्दों से अपना प्रेम
फिर भी लिखता हूं तुम्हारे प्रेम में कविता
कहना चाहता हूं
पर कभी पूरी नहीं होती...
हमेशा अधूरी होती है प्रेम की कविता

--- नरेन्द्र कुमार कुलमित्र

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