Narendra Kumar Kulmitra
Wednesday, 19 August 2026
दरख़्त-सी ज़िंदगी 29.06.23
दरख़्त-सी है यह ज़िंदगी,
ख़्वाब इसके पत्ते हैं।
वक़्त के साथ पककर
पीले पड़ जाते हैं,
फिर शाख़ों से टूट जाते हैं...
पर देखते ही देखते फिर,
बीते ख़्वाबों की तरह,
नई कोपलों से
लद जाते हैं दरख़्त।
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