Wednesday, 19 August 2026

दरख़्त-सी ज़िंदगी 29.06.23

दरख़्त-सी है यह ज़िंदगी,
ख़्वाब इसके पत्ते हैं।
वक़्त के साथ पककर
पीले पड़ जाते हैं,
फिर शाख़ों से टूट जाते हैं...
​पर देखते ही देखते फिर,
बीते ख़्वाबों की तरह,
नई कोपलों से
लद जाते हैं दरख़्त।

No comments:

Post a Comment