Monday, 24 October 2022

अनकही बातें...

अनकही बातें
तुम हृदय में ही रहना
ज़बान पर मत आना...

अलिखे शब्द
तुम भावों में ही रहना
पन्नों पर नहीं उतरना...

न जाने फिर कोई बुरा न मान जाए...
न जाने फिर कोई हंगामा न हो जाए...

Thursday, 6 October 2022

नमक का होना --07.10.22

मुझे टूटने और टूटकर गिरने से कभी डर नहीं लगता
मुझे विश्वास है अपने वजूद पर
अगर टूट कर बिखर भी जाऊं
तो मिट्टी में दबे बीज की तरह एक दिन फिर अंकुरित हो जाऊंगा

अब नफरत ही प्यार है --30.08.22

अब नफरत ही प्यार है --30.08.22
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मुझे नहीं बताना 
कि मैं किस किस से प्यार करता हूं और किस किस से नफरत

हो सकता है कि आप गलती से प्रेम का इजहार करें
और बदले में आपको बेशुमार नफरत का तूफान मिल जाए
अब प्यार के बदले में प्यार मिले इसकी संभावना कम होती जा रही है धीरे-धीरे

प्यार करने वाले दुबके बैठे हुए हैं
कि कहीं  नफरतियों की नजर उन पर ना पड़ जाए

नफरत से प्यार करने वालों की भीड़ में
बड़ी मुश्किल है प्यार से प्यार करने वालों को ढूंढ पाना

हो सकता है कि आप प्यार ढूंढने जाओ
और प्यार ढूंढने के चक्कर में
लहूलुहान होकर बचा खुचा प्यार खोकर वापस लौटो

आपको नफरती वायरस के संक्रमण से कोई भी मास्क नहीं बचा सकता
कोरोना इतना संक्रमित नहीं जितना नफरत है इन दिनों

धीरे-धीरे एक नई समझ विकसित होते जा रही है
जिसमें लोग नफरत को प्यार और प्यार को नफरत समझने लगे हैं

अब नफरत और प्यार के शब्दों से अर्थ निकलकर एक दूसरे में समा गए हैं

अब नफरत ही प्यार है कहना ज्यादा सुविधाजनक है।

-- नरेन्द्र कुमार कुलमित्र
   9755852479

वह मौन चलती रहती है -- 27.08.22

वह मौन चलती रहती है -- 27.08.22
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छुक छुक करती रात दिन दौड़ती रहती है अपनी पटरी पर
लोगों की दूरियां मिटाने भेदभाव और असहमतियों को कम करने अलग-अलग भाषा और संस्कृतियों को एक साथ लेकर 
मौन अनवरत चलती रहती है

हमीं उसे गंदा करते हैं
हमीं उसमें अव्यवस्था फैलाते हैं
हमीं उस पर तरह-तरह के आरोप लगाते हैं
उसके रास्ते में रोड़े बन उसे चलने से बाधित करते हैं
कई बार अपने गुस्से के लिए उसे आग के हवाले कर देते हैं

वह सारे डिब्बों को आपस में जोड़े चलती है
वह चुपचाप चलती है तो हमारा सफर बिना हिचकोले खाए आसान हो जाता है
हम सुने या ना सुने मगर
वह हमें खतरों से बचाने के लिए लंबा हार्न देती है
जब वह पटरी से उतरती है तो भूचाल आ जाता है
अफरा तफरी मच जाती है हमारा जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है
हमने बना दी है उसके चलने के लिए पटरी
उसे केवल पटरी पर ही चलते जाना है

उसमें इतनी जगह होती है कि हम सब का सफर आराम से कट जाता है
वह कमाऊ है रात दिन खटती है हमारा समय बचाती है 
सब कुछ सहती है फिर भी मौन चलती रहती है
चाहे कुछ भी कहो भारतीय रेल या भारतीय स्त्री..।

---नरेंद्र कुमार कुलमित्र
    9755852479

मरना" अब आकस्मिक नहीं लगता - 14.08.22(एक अपरिचित की हादसे में मौत देखकर)

"मरना" अब आकस्मिक नहीं लगता - 14.08.22
(एक अपरिचित की हादसे में मौत देखकर)
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कितना साधारण हो गया है 
किसी के बीमार हो जाने का समाचार

गांव में किसी को बुखार हो जाता था
सुनने वाले आश्चर्य प्रकट करते थे
बीमार व्यक्ति को गांव के लोग देखने जाते थे
सांत्वना सहानुभूति और ढांढस भरे शब्दों में इतनी ताकत होती थी
कि बीमार व्यक्ति जल्दी ठीक हो जाता था
अब सहानुभूति के शब्दों में भी वह ताकत नहीं रही 

अब लोगों को शुगर बीपी ब्रेन हेमरेज कैंसर लिवर किडनी फेल हार्ट अटैक जैसी बीमारियां सर्दी जुकाम सी होने लगी है
तमाम चिकित्सा सुविधाओं के बीच बीमारियों ने लाइलाज होना सीख लिया है
तमाम दवाओं और दुआओं का असर खत्म होते जा रहा है
अब वो दिन गए जब बीमारियों और मौतों पर आश्चर्य हुआ करता था

हम अमूमन रोज सुनने लगे हैं
फला व्यक्ति हार्ट अटैक से मर गया
अमुक व्यक्ति को कैंसर हो गया
बीमारी से बचा खुचा आदमी सड़क हादसे का शिकार हो जाता है
मरना अब आम बात हो गई है
पल पल घटने लगी हैं आकस्मिक घटनाएं
किसी का मरना अब आकस्मिक नहीं लगता।

---नरेंद्र कुमार कुलमित्र
    9755852479

तुम आओ - 21.08.22

तुम आओ - 21.08.22
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तुम आओ
कि जैसे रात के सन्नाटे में
ख्वाब आता है

तुम आओ
कि जैसे लंबे इंतजार के बाद
पैगाम आता है

तुम आओ
कि जैसे साल में एक बार
ईद का चांद आता है

तुम आओ
कि जैसे जेठ की तपिश के बाद
आषाढ़ आता है

तुम आओ 
कि जैसे टूटती देह में 
सांसें आती है

तुम आओ
कि जैसे सर्द रातों के बाद सुबह-सुबह 
गुनगुनी धूप आती है

तुम आओ
कि जैसे लंबे सफर में थकान के बाद
गहरी नींद आती है

तुम आओ
कि जैसे बंजर धरती में सालों बाद
हरियाली आती है

तुम आओ
कि जैसे लंबी नाउम्मीदी के बाद
उम्मीद आती है

तुम आओ
कि जैसे माशूक के लंबे इंतजार बाद
माशूका आती है

तुम आओ 
कि जैसे अमावस की रात में
दिवाली आती है

तुम आओ 
कि जैसे कवियों के अंतस्तल में
कविता आती है

-- नरेन्द कुमार कुलमित्र
     9755852479

ओ मेरी प्यारी किताब ! - 05.08.22

ओ मेरी प्यारी किताब ! -  05.08.22
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मुझे किताबों से प्यार है

मैं हर नई किताब को पढ़ने के लिए बेताब होता हूं
जब कोई नई किताब मेरे हाथ में होती है
जब तक ना पढ़ लूं बेचैन रहता हूं
पुस्तक लेकर अलमारी में सजा देना मेरा काम नहीं 

मुझे तसल्ली या संतुष्टि किताब पढ़ने से ही मिलती है देखने से नहीं

किताबों की पंक्तियों को पढ़ना, शब्दों में ठहरना,अर्थों को महसूसना और भावों में डूबते जाना यही तो आनंद है किताब की

किताबों की अच्छी बातों को हृदय में संजोए रखता हूं
हरदम नई और अच्छी किताब की तलाश में रहता हूं

किताबें जितना पढ़ो ज्ञान के विस्तार का कोई छोर नहीं 
हमें पढ़ते रहना है नई नई किताबें

तुम बिल्कुल नई किताब हो
बड़ी चिकनाहट है तुम्हारे पन्नों में
तुम्हारे हरेक पन्नों के प्रत्येक शब्दों का अर्थ जानना चाहता हूं
तुम्हारे अक्षर गोल गोल और बड़े सुडौल हैं
तुम्हारे काले काले अक्षरों में खो जाना चाहता हूं
बड़े ही आकर्षक हैं आगे और पीछे के तुम्हारे कवर पृष्ठ

मैं अपनी कलम से तुम्हारी महत्वपूर्ण पंक्तियों के नीचे रेखांकित करते हुए
तुम्हारे पृष्ठों को पलटना चाहता हूं
समझ ना आए तो उलट-पुलट कर बार बार पढ़ना चाहता हूं
समय रहते तुम्हें पूरा पढ़ लेना चाहता हूं

ओ मेरी प्यारी किताब !
तुम्हारे बाह्य आवरण इतने अच्छे हैं
तुम भीतर से कितनी अर्थवान होगी कितनी अच्छी होगी
मैं सचमुच तुम्हें पढ़ने के लिए बेताब हूं।

ओ मेरी प्यारी किताब !
पूरे मन से पढूंगा तुम्हें
धन्य हो जाऊंगा तुम्हें पढ़कर
मेरे पढ़ने से शायद तुम भी धन्य हो जाओ
आखिर सच्चे पाठक के पढ़ने में ही तुम्हारी सार्थकता है

ओ मेरी प्यारी किताब !

--नरेंद्र कुमार कुलमित्र
    9755852479