Thursday, 6 October 2022

देख तेरे इंसान की हालत... 07.09.21. व्यंग्य

देख तेरे इंसान की हालत...  07.09.21.         व्यंग्य
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एक शाम टी वी ऑन किया तो अचानक मन किया कि कुछ समाचार सुन लिया जाए। समाचार चैनल लगाया तो वहां भक्तिमय रामधुनी हो रही थी।सभी भक्त ढोल मंजीरे के साथ बड़े भक्ति भाव से रामधुन गाते हुए पीले और भगवा वस्त्र में सुशोभित हो रहे थे।एक पल के लिए मुझे अपने आप पर डाउट हुआ कि गलती से समाचार चैनल की जगह भक्ति चैनल तो नहीं लगा लिया हूं। आंखें मिचकर दोबारा ठीक से देखा तो पता चला कि समाचार चैनल ही लगा हुआ है।फिर सोचा कि जरूर यह किसी धार्मिक स्थल अयोध्या वगैरह का दृश्य होगा।पर मैं गलत था। दृश्य कहीं और का था जिसे मैं देखकर चौंक गया।
                          समाचार आपको चौंका न दे  तो फिर वह किस बात का समाचार है। समाचार चैनलों की असली सफलता तो अपने समाचारों से दर्शकों को चौंका देने में होती है।चौंकाने वाले समाचारों से ही  समाचार चैनलों की टी आर पी बढ़ती है। समाचार चैनल अपने उद्देश्य में सफल था क्योंकि समाचार सुनकर मैं ख़ुद चौंक गया था। यकीन मानिए  उस समाचार के बारे में आपको बताऊंगा तो आप भी बिना चौंके नहीं रह सकेंगे। दरअसल रामधुन का वह भक्तिमय धार्मिक दृश्य न तो अयोध्या का था न ही किसी  मंदिर परिसर  का था। आप चौक गए ना मैंने पहले ही कहा था। जनाब जरा धैर्य बांधकर सुनते जाइए आगे तो आप बस चौंकते ही जाएंगे।
                    मनोविज्ञान का नियम कहता है कि हम किसी दृश्य घटना पर तब चौंकते हैं जब वह सामान्य से असामान्य या साधारण से असाधारण होती है। आप भली-भांति जानते हैं कि यह इतना बड़ा देश है और यहां तरह-तरह के बहुरंगी लोग रहते हैं। तरह-तरह के लोगों के विचार भी तरह-तरह के होते हैं। जिस दृश्य या घटना से आप बुरी तरह चौक जाते हैं, हो सकता है कुछ लोग उस तरह के दृश्य या घटनाओं से बिल्कुल भी ना चौके। जो घटना आपको असाधारण और असामान्य लगती है वहीं घटना किसी को साधारण और सामान्य भी लग सकती है। किसी दृश्य घटना को देखकर आप बुरी तरह विचलित हो जाते होंगे मगर उसी दृश्य या घटना से कुछ लोगों को कुछ भी फर्क ही नहीं पड़ता होगा। खैर चौकाने वाले लोग चौकाते रहेंगे आप तो बस चौंकते रहिए। आप चौंकाने वाली घटना को भला कहें बुरा कहें उस घटना की प्रशंसा करें आलोचना करें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता किसी को। चौंकाने वाली घटना को अंजाम देने वाले वालों को इससे तो बिल्कुल भी फर्क नहीं पड़ता। अरे मैं तो चौंकने और चौकाने की बातों में समाचार बताना ही भूल गया।
                           समाचार की वह घटना और वह दृश्य किसी प्रदेश के विधानसभा भवन का था। आपको क्या लगता है कि विधानसभा में धार्मिक गतिविधियां नहीं हो सकती। यदि आप ऐसा सोचते हैं तो आप गलत हैं। जब विधानसभा में नमाज की जा सकती है तो फिर राम भक्तों द्वारा राम धुन करने में हर्ज ही क्या है ? जब विधानसभा में मंदिर और मस्जिद की व्यवस्था हो सकती है तो फिर अरदास करने के लिए गुरुद्वारे और प्रार्थना के लिए चर्च की व्यवस्था क्यों नहीं हो सकती है? फिर तो जैन,बौद्ध,पारसी और भी जितने धर्म वाले होंगे सभी के लिए विधानसभा में व्यवस्था करनी पड़ेगी। हमारे देश को धर्मप्राण देश ऐसे ही नहीं कहा जाता है। यह अलग बात है कि धर्म का मतलब समझने वाले आपको मिले या ना मिले मगर धर्म के नाम पर प्राण देने वाले और प्राण लेने वाले अनेक मिल जाएंगे।
                    भाई साहब यह धर्म प्रधान देश है। यहां की जनता बड़ी धार्मिक होती हैं। मैं तो कहता हूं कि धर्म से बढ़कर और धर्म से बाहर कोई चीज हो भी नहीं सकती। आप दुनिया में किसी के भी खिलाफ जा सकते हैं मगर धर्म के खिलाफ नहीं जा सकते। कमाल की बात तो यह है कि देश में धर्म की प्रधानता है मगर देश का संविधान धर्मनिरपेक्ष है। धर्म को लेकर हमारा संविधान बिल्कुल न्यूट्रल है। वह न तो किसी धर्म का समर्थन करता है ना ही विरोध करता है। संविधान की हालत तो उस बेचारे की तरह है जिसे कोई भी कुछ कहे कोई भी कितना भी सताए वह चुपचाप सहन करते रहता है देखते रहता है बिल्कुल मौन।
                            मैं इस बात को लेकर आज तक कंफ्यूज होते रहा हूं कि हमारे देश के लिए विविधता में एकता जरूरी है या मजबूरी ? हम कौमी एकता के लिए गाते हैं कि "मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना"  इस गाने से मुझे यह समझ नहीं आया कि आखिर बैर सिखाता कौन है ? आपस में बैर सिखाने वाले हमारी नजरों से आखिर कैसे बच जाता है ? मुझे पता है हम आगे भी विनय चंद्र मौद्गल्य के गीत "हिंद देश के निवासी सभी जन एक है, रंग रुप वेश भाषा चाहे अनेक है।"गाते रहेंगे। साहिर लुधियानवी जी के गीत "तू हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा इंसान की औलाद है इंसान बनेगा।"गुनगुनाते रहेंगे। बहरहाल मैं इतना ही कहूंगा कि इंसान की औलादों को इंसान बने रहने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए। अन्यथा मुझे प्रदीप कुमार जी के गीत गाने पड़ेंगे "देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान, कितना बदल गया इंसान-कितना बदल गया इंसान।"

--नरेंद्र कुमार कुलमित्र
   9755852479

Monday, 16 May 2022

अंधेरे का व्यापार 16.05.21

अंधेरे का व्यापार 16.05.21
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रोशनी की शक्ल में बेचा जा रहा है अंधेरा
रोशनी में लिपटे अंधेरे का व्यापार खूब फल फूल रहा है इन दिनों
अंधेरे के प्रचार में चारों ओर फैले हुए हैं उल्लू के पट्ठे 
इस व्यापार में केवल उल्लुओं को फायदा है
जितना सघन अंधेरा हो उतना अच्छा है
उन्हें रोशनी से डर लगता है

उल्लू बनाने वालों और उल्लू बनने वालों के तंत्र का नाम लोकतंत्र हो गया है

अंधेरा सलामत है
रोशनी कहीं नहीं है।

-- नरेन्द्र कुमार कुलमित्र 
   9755852479

अगले जनम मोहे चमचा ही कीजो ! व्यंग्य

अगले जनम मोहे चमचा ही कीजो !                  व्यंग्य
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चाटुकारी करना,चमचागिरी करना,खुशामद करना,चापलूसी करना,तलवे चाटना,मक्खन लगाना ये सारे पर्यायवाची शब्द हैं।इन शब्दों और वाक्यांशों को आप पहले ही सुने होंगे और भली-भांति परिचित भी होंगे। इन वाक्यांशों के अर्थों को श्रद्धापूर्वक और समर्पण के साथ निभाते हुए कईयों को आपने देखा भी होगा।
              चमचागिरी पर कुछ लिखने से पहले मैं धन्यवाद अर्पित करना चाहूंगा अपने एक करीबी मित्र चमचे के प्रति जिनकी चमचागिरी देखकर मेरे भीतर कुछ लिखने का भाव उत्पन्न हुआ। दरअसल मैं एक दिन अपने मित्र के केबिन में दाखिल हुआ वहां केक काटे जा रहे थे। मैंने कारण पूछा भाई क्या बात है किस खुशी में केक काटे जा रहे हैं? पता चला कोई स्थानीय नेता है जिसका जन्मदिन था और हमारे मित्र उनके मुरीद हैं। मुरीद क्या पक्के चमचे हैं। मित्र की चमचागिरी देखकर चमचों को ईर्ष्या या उससे होड़ करने की चाहत हो सकती है। मगर मित्र को चमचागिरी में लीन देखकर मैं अपार गुस्सा और घृणा भाव से भर जाता हूं। मैंने मित्र के पास यदा-कदा दूसरे चमचों की चमचागिरी की खूब निंदा की भर्त्सना की ताकि मित्र अपनी चमचागिरी की आदत से बाज आए। मगर मित्र है कि चमचों के और चमचागिरी के पक्ष में दलील देने लग जाते हैं। वे स्वयं को बड़ा दयनीय तथा चमचागिरी को अपनी मजबूरी बताने लगते हैं। 
                        एक सच्चा चमचा अपने स्वामी की भक्ति में ईश्वर तुल्य सेवा भाव में लगा रहता है। चमचे द्वारा की जाने वाली चमचागिरी किसी तपस्या या साधना से कम नहीं होता। सेवाभावी समर्पित भक्त की तरह चमचे को अपनी चमचागिरी पर अटूट श्रद्धा और विश्वास होता है। जिस प्रकार एक सच्चा साधक या तपस्वी अपने इच्छित वरदान को प्राप्त नहीं कर लेता तब तक अपने कठिन साधना और तपस्या पथ से कभी विचलित नहीं होता । ठीक उसी प्रकार एक चमचा भी तन मन धन सब कुछ समर्पित कर पूरे स्वार्थ भाव से चमचागिरी में लीन होता है। स्वामी भी अपने चमचों को सारा वरदान एक साथ नहीं देता। वह थोड़ा-थोड़ा इंस्टॉलमेंट में कृपा करता है ताकि उसके चमचों की चमचागिरी सतत रूप से उस पर बनी रहे। आसान शब्दों में कहूं तो चमचागिरी फेवीकोल की तरह होता है जो स्वामी और उसके चमचों को अटूट रूप से आपस में चिपकाए रहता है जो आसानी से नहीं टूटता।
                       चमचे और स्वामी के बीच चमचागिरी ही वह बांड होता है जो दोनों के संबंध को मजबूत बनाता है। चमचागिरी के पार्टीकल जितने सघन होते हैं उतने ही स्वामी और चमचे के बीच का बांड मजबूत होता है। कई बार चमचागिरी के पार्टिकल्स कम होने से बांड टूट जाता है जिससे दोनों के बीच संबंध विच्छेद हो जाता है। इसीलिए चमचा इस बात का बराबर ध्यान रखता है कि उसका बांड कमजोर ना हो ताकि दोनों के बीच का संबंध मजबूती से बना रहे।
                      चमचागिरी करने के छोटे-बड़े कई कारण हो सकते हैं। जैसे उच्च पद पाने की आकांक्षा, आर्थिक लाभ, काम से बचने की चाहत, स्वामी के करीबी होने की लालसा, नाकामी छुपाने का रास्ता, अंतर में व्याप्त डर भाव, स्वामी के कोप से बचने का उपाय, ट्रांसफर करवाना या रूकवाना आदि आदि। बेशक चमचागिरी के अनगिनत कारण हो सकते हैं मगर सब के मूल में अपने स्वार्थ की सिद्धि भाव ही प्रमुख रूप से निहित होता है।
                           अनादि काल से चमचागिरी यत्र तत्र सर्वत्र व्याप्त रहा है। घर में परिवार में कार्यालय में मंत्रालय में शासन में प्रशासन में हर जगह चमचागिरी की जड़ें फैली हुई है। पक्का चमचा उस  बेशरम पौधे की तरह होता है जिसे जहां भी उखाड़ फेंको वह अपनी जड़े जमा लेता है। चमचा खेतों की फसलों में उगे खरपतवार की तरह होता है। जिस प्रकार फसलों की जितनी भी सफाई करो खरपतवार उग ही जाता है वैसे ही शासन प्रशासन के खेतों से चमचा रूपी खरपतवार को निकाल पाना असंभव है।
                         राजनीति में आगे बढ़ने के लिए चमचागिरी अनिवार्य तत्व है। यहां आपकी बुद्धि आपकी काबिलियत और आपकी शक्ति आपकी चमचागिरी से ही नापी जाती है। नेताजी जैसे ही पदार्पण करते हैं उनके चमचों का दल नेताजी के करीब जाने उन्हें छूने उनके साथ सेल्फी लेने के लिए टूट पड़ते हैं। चमचों में जो सीनियर होता है वह जूनियर और नवोदित चमचों का नेता जी से परिचय कराता है। नेताजी के आवभगत के लिए जो मिष्ठान मेवे और ड्राई फ्रूट्स सजाए गए होते हैं उन्हें स्वामी के चरणों में अर्पित प्रसाद समझकर सारे चमचे बड़े चाव से खाते हैं। कुल मिलाकर राजनीति में चमचागिरी ही वह सीढ़ी है जिसके सहारे आप ऊपर पहुंच सकते हैं। जब कोई राजनीति में कदम रखता है यानी सीढ़ी के पहले पायदान पर पांव धरता है तब सबसे ज्यादा और सबकी चमचागिरी करनी पड़ती है। अगर आप राजनीति के सीढ़ी में ऊपर जाते जाएंगे तो आपके भी चमचों की संख्या बढ़ती जाएगी। यानी आज का चमचा ही भविष्य का नेता होता है।एक राजनेता अपने चमचों के बदौलत ही दौलत,शोहरत और सम्मान प्राप्त करता है इसीलिए वे चमचों को खिलाना पिलाना और हमेशा खुश रखना अपना परम दायित्व समझता है। अक्सर यह देखा गया है की चमचे अगर नाराज होकर बगावत पर उतर जाते हैं तो नेताजी की कुर्सी खतरे में आ जाती है। जब चुनाव के समय नेताजी का आत्मविश्वास डगमगाने लगता है और वह निराशा के समुद्र में डूबने लगता है। ऐसी विषम परिस्थितियों में वे चमचे ही होते हैं जो अपने  चाटुकारिता के दम पर नेताजी के आत्मविश्वास को जगाते हैं और उन्हें निराशा के समुद्र से बाहर निकालते हैं। इसीलिए नेताजी को दुनिया में सबसे प्रिय उनके चमचे ही होते हैं।
                                 जब चमचा अपने स्वामी के बारे में बोलना शुरू करता है तो उसके नाम के आगे सैकड़ों प्रशंसामूलक विशेषण शब्दों का प्रयोग करता है। राजनीति के क्षेत्र में चमचों के द्वारा प्रयुक्त होने वाले कुछ शब्द हैं जैसे जुझारू,मिलनसार,कर्तव्यनिष्ठ,कर्मठ,जन जन के प्रिय,युवा,लाडला,सेवाभावी,समर्पित,ऊर्जावान, सच्चा देशभक्त,निष्ठावान,समाजसेवी, यशस्वी,माननीय आदि आदि। इसी तरह धर्म और अध्यात्म के क्षेत्र में अपने स्वामी के लिए उसके चमचे चेलों के द्वारा प्रयुक्त किए जाने वाले विशेषण शब्दों में  है त्रिकालदर्शी, परम ज्ञानी, परम स्नेही, मानस मर्मज्ञ, दयालु कृपालु ज्ञानदाता,समदर्शी, श्रद्धेय आदि आदि। कार्यालयों में अपने बॉस के लिए उसके मातहत चमचों के द्वारा संबोधन में अनेक विशेषणों का प्रयोग किया जाता है जैसे परम सम्माननीय, प्रेरणा स्रोत, समर्पित, बहुमुखी प्रतिभा के धनी, श्रेष्ठ वक्ता आदि आदि। साहित्य के क्षेत्र चमचों के द्वारा अपने  वरिष्ठ साहित्यकारों के लिए प्रयुक्त शब्द हैं सादगी के प्रतिमूर्ति, संजीदा रचनाकार, वरिष्ठ कलमकार, शब्दों के जादूगर, मुखर कवि,शब्द शिल्पी, जमीन से जुड़े, निर्भीक साहित्यकार आदि। पर सच्चाई यह है कि चमचों के द्वारा अपने विशेष्य के लिए प्रयुक्त किए गए तमाम विशेषणों को तलाशना रेत से तेल निकालने जैसा काम है।
                                   आज हर जगह चमचों का बड़ा बोलबाला है। जो काम धनबल और बाहुबल से नहीं हो पाता वह चमचाबल से बड़ी आसानी से हो जाता है। आप चमचों की लाख उपेक्षा करिए उन्हें घृणा भरी नजरों से देखिए मगर उनमें काबिलियत भी कूट-कूट कर भरी होती है। चमचागिरी जन्मजात गुण नहीं होता इसे अर्जित किया जाता है। चमचागिरी के गुणों को अर्जित करना और चमचे के ओहदे तक पहुंचना सबके बस की बात नहीं होती। चमचागिरी में कोई चमचा जितना निपुण होते जाता है उतना ही उसकी पहचान समाज में बढ़ते जाता है। हमने अपने जीवन में ऐसे कितने चमचों को अपनी सच्ची चमचागिरी के दम पर फर्श से अर्श तक पहुंचते देखा है। हम समझते हैं की चमचा हमेशा मजे में रहता है। मगर हमेशा ऐसा नहीं होता कभी-कभी वह बड़ा बेचारा सा जीव नजर आता है। बॉस के कहे अनुसार चौकसी और चमचागिरी ढंग से नहीं हो पाने के कारण उसे अपने बॉस से डांट सुननी पड़ती है वहीं दूसरी तरफ स्टाफ के बाकी सदस्य उस पर फिकरे करते रहते हैं कि"वो आ रहा है बॉस का चमचा।" ऐसे हालात में बेचारा चमचा अपना बॉस के लिए आया गुस्सा और स्टाफ की उपेक्षा से उत्पन्न दुख दोनों को चुपचप
 अकेले ही पीते रहता है। 
                                चमचा अपने स्वामी का अंधभक्त होता है। कुत्ते की तरह चमचे की वफादारी पर स्वामी को कभी संदेह नहीं होता। चमचा जीहुजूरी में इतना पक्का होता है कि सपने में भी अपने स्वामी की बात को नहीं काट सकता। स्वामी के हरेक बातों पर हामी भरना वह अपना परम कर्तव्य समझता है। कड़कती ठंड में भी अगर स्वामी कह दे की आज बड़ी गर्मी है तो चमचा अपना स्वेटर निकाल फेंकेगा और कहेगा "सचमुच आज अचानक बहुत गर्मी लग रही है।" भले ही वह ठंड से कांपता ही क्यों ना रहे। चमचों का फलसफा क्लियर होता है। वे सुखी बने रहने के लिए चमचागिरी को ही सबसे सॉलिड और आसान उपाय मानते है। उनके खून में काम करना मेहनत करना बिल्कुल नहीं होता। वे अपने स्वामी के गलत बातों और गलत कार्यों का कभी विरोध नहीं करते। बॉस की बातों में बस हां में हां मिलाते रहते हैं। उनके लिए चमचागिरी उस नाव के समान होता है जिस पर चमचा सवार होकर इस उतार-चढ़ाव और मुश्किल भरे दुनिया से पार निकल जाना चाहता है। निष्कर्षतः जा सकता है की तलवे चाटने का सुख वही व्यक्ति ले सकता है जिसमें आत्मसम्मान की भावना सूख गई हो।
                               हर संस्था में बॉस के अपने कुछ चुनिंदा चमचे होते हैं। बॉस संस्था में नहीं होते हुए भी संस्था के सारी बातों को जान लेता है। चमचे ही बॉस के आंख और कान होते हैं। स्टाफ का सदस्य कब कौन आता है कब कौन जाता है चमचा चुपचाप देखते रहता है। यानी हम कह सकते हैं कि चमचा ही बॉस का जीता जागता सीसीटीवी कैमरा होता है। संस्था प्रमुखों के लिए संस्था चलाने में उनके चमचों का अहम योगदान होता है। संस्था प्रमुख अपने चमचों को चमचागिरी के एवज में काम करने में छूट देता है। चमचा जब छुट्टी चाहे बॉस खुशी-खुशी छुट्टी दे दे देता है। आप एक दिन की छुट्टी के लिए संस्था प्रमुख के सामने गिड़गिड़ाते रहिए मिन्नतें करते रहिए वह साफ मना करेगा,कहेगा"अभी बहुत काम है स्टाफ कम है हम किसी को छुट्टी नहीं दे सकते।"
                          स्वामी,नेता या बॉस कान के बड़े कच्चे होते हैं। वे अपने चमचों से जितना सुनते हैं उसे ही सौ फ़ीसदी सच मान लेते हैं। चमचे कान भरने के काम में पारंगत होते हैं। उन्हें एक को ग्यारह और चार को चौदह बताने की कला भली-भांति आता है। अगर आप अपने बॉस को कोई बात सीधे तौर से नहीं कर पाते तो उसके चमचों के सामने वह बात कह दीजिए फिर तो चमचों के माध्यम से आपकी बात पहुंच ही जाएगी। मगर भले मानुषों को मेरा यही सलाह है कि आप चमचों से सदा सावधान रहिए उनसे पंगा कभी मत लीजिए।
                            चमचे बिना पेंदी के लोटे की तरह होते हैं। कभी इधर तो कभी उधर अवसर के अनुकूल लुढ़कते रहते हैं। उनका अपने स्वामी के प्रति भक्ति और समर्पण स्थाई नहीं होता। स्वामी में शक्ति और सामर्थ्य जितनी होती है उसी के अनुरूप चमचे की चमचागिरी होती है। जिस प्रकार पेड़ सूखने पर चिड़िया पेड़ छोड़ उड़ जाती है, तालाब या नदी के सूखते सूखते वहां के जीव जंतु अपना जगह बदल लेते हैं ठीक उसी प्रकार अपने स्वामी की शक्ति क्षीण होते देख चमचा भी किसी दूसरे शक्ति संपन्न स्वामी की ओर उन्मुख हो जाता है। भौतिक शास्त्र की दृष्टिकोण से समझा जाए तो चमचा एक चर राशि (वेरिएबल अमाउंट) होता है जो समय और स्थान के बदलने के साथ-साथ हमेशा बदलते रहता है। सैद्धांतिक रूप से चमचागिरी के नियम को हम इस तरह समझ सकते हैं "चमचे का स्वार्थ स्थिर होने की दशा में चमचा के द्वारा की गई चमचागिरी की मात्रा उसके स्वामी में निहित शक्ति और सामर्थ्य की मात्रा के बराबर होती है।"
                               मुंह पर खरी-खोटी बोल देने वालों को मुंहफट कहा जाता है। जबकि आपके मुंह के सामने आपकी प्रशंसा के पुल बांधने लगे और अपनी शहदमयी वाणी से आपके तन मन को भिगो दे वह चापलूस कहलाता है। चापलूस में ऐसी प्रतिभा होती है कि जिन अच्छाइयों और गुणों को आप अपने भीतर स्वयं नहीं देख पाते वह भी चापलूस भली-भांति देख लेता है।चापलूस अपनी बातों से सबका मन मोह लेता है। जरा सोचिए चापलूस की प्रेमिका के बारे में वह कितनी खुश रहती होगी। चापलूस की प्रेमिका के पांव कभी जमीन पर पड़ते ही नहीं होंगे। चापलूस की प्रेमिका होने का यही तो फायदा है कि सुबह से रात तक केवल तारीफों की नदियां में डुबकी लगाते रहने का सौभाग्य मिलता है। चापलूसों में एक बात अच्छी होती है कि वे किसी को पराया नहीं समझते। उनमें इतनी सम्मोहन शक्ति होती है कि वे सबको पहली नजर में ही अपना बना लेते हैं। आप किसी चापलूस से पहली बार ही क्यों ना मिले वह ऐसा मुस्कान विखेरेगा जैसे आपको सदियों से जानता हो।हां एक बात जरूर है कि चापलूसों को ज्यादा ईमानदार,वक्त के पाबंद और सिद्धांतों के पक्के लोग बिल्कुल पसंद नहीं आते। वे यहां भी अपनी चापलूसी भरे शब्दों में फंसाने की कोशिश करते हैं पर फिर भी अगर चापलूसी के दाल नहीं गलती तो बेचारे मन मसोसकर रह जाते हैं। कुछ लोग चापलूसी को बिल्कुल भी पसंद नहीं करते। वे चापलूसों को हिकारत भरी दृष्टि से देखते हैं। ऐसे लोगों को अपने काम पर ही भरोसा होता है। ये अलग बात है कि उन्हें अपने स्वामी की चापलूसी ना करने के कारण कई बार कोप का शिकार होना पड़ता है। ऐसे लोग बड़े स्वाभिमानी और निडर होते हैं जिन्हें अपने स्वामी द्वारा दिए गए गीदड़ भभकी और अर्थहीन कोप से कतई डर नहीं लगता है।
                                'चम्मच' चमचा का बाल रूप होता है और 'चमचा' चम्मच का वयस्क रूप। बाल रूप में होने वाली चम्मचगिरी वयस्क होते-होते चमचागिरी में बदल जाता है। चम्मच के पास क्षमता और अनुभव दोनों की कमी होती है इसीलिए चम्मच का प्रयोग केवल छोटी-मोटी कटोरियों में ही किया जाता है। उनमें इतनी क्षमता नहीं होती कि उनका प्रयोग बड़े-बड़े बर्तनों में किया जा सके। चम्मच सीमित कामों में ही काम आते हैं जबकि चमचों का कार्य क्षेत्र अत्यंत विस्तारित होता है। जिस प्रकार करछुल कड़ाही की चीजों को पतीले में पतीले की चीजों को थाली में यानी इधर का उधर करने में काम आता है ठीक उसी प्रकार चमचा भी यहां की बातों को वहां करने में माहिर होता है। अगर हमें कोई बड़ा काम करवाना है तो हमेशा चमचे ही काम आते हैं। चमचों की दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति देखकर कभी-कभी भले मानुषों को भी अपने चमचा ना होने का गम होता है।आखिरकार चमचों की ऐसी समृद्धि देखकर भले मानुष भी मंदिर में भगवान के सामने एक ही प्रार्थना करता है-"हे प्रभु अगले जनम मोहे चमचा ही कीजो।"

-- नरेंद्र कुमार कुलमित्र
    9755852479
                     

Thursday, 21 April 2022

जिंदा रहने की कोशिश है 'लिखना'-14.04.22

जिंदा रहने की कोशिश है 'लिखना'-14.04.22
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नहीं भूलती हैं लिखी हुई चीजें
शायद भूलने को परास्त करने के लिए खोजा गया होगा 'लिखना'

'लिखना' सीखने से पहले
हम सीखे होंगे 'बोलना'
मगर 'लिखने के बिना' कितना निराधार रहा होगा 'बोलना'
बोलने की प्रामाणिकता पर रोज उठाए जाते रहे होंगे सवाल
'बोला हुआ' सहीं होने पर भी 
 रोज कलंकित होता रहा होगा

'लिखना' सीखने से पहले
ना जाने कितनों ने की होगी वादा खिलाफी
ना जाने कितने
अपनी ही कही बातों पर
कभी भी मुकर जाते रहे होंगे
न जाने कितनी बार
स्मृतियों पर लगाए जाते रहे होंगे लांछन

लिखने के क्रम में हमने सीखा है
दृश्यों,घटनाओं और आंकड़ों को लिखना और सहेजना

अब लिखना महज लिखना नहीं है
'लिखना' कला है
रंगों को, संवेदनाओं को, हंसी को, रुदन को, प्रेम को,करुणा को,घृणा को रिश्तो को बड़े अलंकृत भाषा में लिखे जा रहे हैं

हम अक्सर भूल जाते हैं
दिन और तारीखें
पुराने दोस्तों के नाम और चेहरे
इन्हीं वजहों से
हमारे पूर्वजों ने
स्मृतियों की दगाबाजी से परेशान होकर
अपनी बातों को लिपियों में दर्ज करने का हुनर सीखे होंगे

हम जानते हैं अपनी सीमाएं
कि हम समय को रोक नहीं सकते
इसीलिए चुपचाप हम समय को दर्ज करते जाते हैं

और कुछ नहीं दरअसल
अपने समय को लिखते जाना
दबे पन्नों के अक्षर चिन्हों में
खुद को जिंदा रखने की कोशिश होती है।

-- नरेंद्र कुमार कुलमित्र
   9755852479

कीचड़ होता है युद्ध -13.04.22

कीचड़ होता है युद्ध -13.04.22
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युद्ध को
युद्ध से ही
खत्म करने की कोशिश करना
ठीक वैसी ही कोशिश है
जैसे कीचड़ को 
कीचड़ से ही धोने की कोशिश करना

कीचड़ हो या युद्ध
हम संभल ही नहीं पाते
गिरते ही जाते हैं

दाएं बाएं के लोग भी
कीचड़ की छीटों से नहीं बच पाते

शहरों गलियों और घरों-घरों तक
बड़ी तेजी से फैलने लगता है कीचड़

कीचड़ में सने,पुते और धंसे लोगों को
कुछ भी सुनाई नहीं देती

कीचड़ की बाढ़ में
तबाह हो जाती हैं लहलहाती फसलें
दफन हो जाती हैं फलती फूलती सभ्यताएं

एक बार पांव रखने के बाद
बस धंसते ही जाते हैं
चाहे कीचड़ हो या युद्ध..।

--नरेंद्र कुमार कुलमित्र
  9755852479

'यात्री हो चला' किताब के पन्नों से... 12.04.22

'यात्री हो चला' किताब के पन्नों से... 12.04.22
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भागवत सांवरिया के 80 पृष्ठ में संकलित इस यात्रा वृतांत में छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड के उन स्थलों का चित्रण किया है जहां वे एक यात्री के रूप में अपने मित्रों के साथ भ्रमण किया है। युवा यात्री भागवत सांवरिया के यात्रा वृतांत की खासियत यह है कि वह अपनी यात्रा के दौरान देखें और महसूस किए हर एक बातों को रोज का रोज यात्रा के दौरान ही दर्ज करते जाते हैं। असली यात्रा वृतांत वही होता है जिसमें यात्रा के दौरान के पल-पल आने वाले दृश्यों और घटनाओं का ब्यौरा समाया होता है। कोई यात्रा वृतांत तब और महत्वपूर्ण हो जाता है जब उसमें दृश्य और घटनाओं की खूबियों और कमियों का बेबाकी से उजागर किया जाता है। चूंकि यात्री पेशे से शिक्षक और साहित्य के प्रति लगाव रखने वाले हैं इसलिए दृश्य और घटनाओं को अधिक संवेदनशीलता के साथ महसूस कर पाते हैं। अजय जी इस किताब की प्रस्तावना में 'संवेदनशीलता की यात्रा' शीर्षक दिए हैं जो कि बिल्कुल उचित प्रतीत होता है।
           लेखक का यह यात्रा वृतांत मूल रूप से भारतीय संस्कृति के दो हिस्सों पर केंद्रित है पहला धार्मिक संस्कृति और दूसरा आदिवासी संस्कृति। इन दोनों संस्कृतियों के चित्रण में प्रकृति चित्रण अनायास रूप से समाहित है। जहां छत्तीसगढ़ की धरती अपनी विशिष्ट आदिवासी संस्कृति एवं प्राकृतिक सौंदर्य के लिए विख्यात है तो उत्तराखंड की धरती तीर्थ और हिंदू धर्म संस्कृति के साथ हिमालयीन खूबसूरती के लिए विश्व विख्यात है।
                 इस यात्रा वृतांत किताब के प्रकाशन से पूर्व लेखक को यात्रा स्थलों के चित्रण में क्रम का ध्यान रखा जाना चाहिए था। छत्तीसगढ़ प्रदेश के स्थलों का पूरा चित्रण पहले किया जाना था तत्पश्चात उत्तराखंड के स्थलों का चित्रण करना उचित होता। पहले छत्तीसगढ़ फिर उत्तराखंड उसके बाद फिर छत्तीसगढ़ के स्थलों का चित्रण क्रम की दृष्टि से उचित प्रतीत नहीं होता है। यात्रा के तिथि क्रम की दृष्टि से भी बेला पानी का चित्रण सबसे पहले होना था। हालांकि पाठकों के लिए पाठकीय वस्तु ही महत्वपूर्ण होता है ना कि पाठकीय वस्तु का क्रम फिर भी समीक्षकीय दृष्टि छोटी-छोटी बातों तक अपनी पहुंच बना लेती है।
                  लेखक पुस्तक के तीन खंडों में अपनी यात्रा का चित्रण करते हैं। पहले खंड का नाम दिया है 'रहस्यों की धरती बस्तर' जिसमें छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल क्षेत्र बस्तर के विभिन्न पर्यटन स्थलों का चित्रण किया है,जिसमें दंतेवाड़ा,ढोलकल,जगदलपुर कुटुमसर गुफा,तीरथगढ़ एवं चित्रकूट जलप्रपात का चित्रण समाहित है। दूसरे खंड का नाम 'देव भूमि उत्तराखंड-छोटा चार धाम'है ,जिसमें हरिद्वार,हरिद्वार से बड़कोट,यमुनोत्री,गंगोत्री,केदारनाथ धाम,बद्रीनाथ धाम का चित्रण हुआ है। तीसरे खंड का नाम 'बैगा गांव बेला पानी में एक दिन' है,जिसमें बैगा आदिवासियों से भरपूर छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले के दूरस्थ जंगल में बसे आदिवासी ग्राम बेलापानी की यात्रा का चित्रण है।
                        यात्रा वृतांत के पहले खंड के अंतर्गत दंतेवाड़ा की यात्रा में विशेष रुप से दंतेश्वरी मंदिर का चित्रण किया गया है जिसमें लेखक मंदिर के ऐतिहासिक पहलुओं पर ज्यादा ना लिखते हुए मंदिर दर्शन के समय अपनाए जाने वाले तौरतरीकों एवं सादगी का विशेष रूप से उल्लेख किया है। शायद यायावरी सोच रखने वाले यात्री के लिए किसी स्थान की ऐतिहासिकता पर ज्यादा लिखना उचित नहीं लगता, वे यह काम इतिहासविदों के लिए छोड़ देते हैं। लेखक अपनी यात्रा के दौरान मिलने वाले लोगों तथा उनसे जुड़े संस्मरणों के बारे में बराबर लिखते जाते हैं। ढोलकल यात्रा में गणेश जी का दर्शन, सल्फी (बस्तर बियर) और रास्ते की दुर्गमता,प्राकृतिक छटा के साथ वहां की किवदंतीयों का उल्लेख किया गया है। बस्तर अपने प्राकृतिक सौंदर्य,आदिवासी संस्कृति और भौतिक संसाधनों के लिए विश्व विख्यात है। आदिवासियों की सबसे बड़ी खूबी होती है उनका भोलापन, यही खूबी उनके शोषण का महत्वपूर्ण कारण भी है। लेखक अपनी बस्तर यात्रा में वहां हुए बदलाव का चित्रण करते हुए लिखते हैं-"यहां आकर आप अनायास बस्तर पा लेंगे ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। हां बहुत सी दुकानें जरूर दिखेंगी बस्तर टी स्टॉल से लेकर बस्तर चिकन बिरयानी तक। बस्तर कॉटन से लेकर बस्तर रेडीमेड तक और भी बहुत कुछ बस नहीं दिखेगा तो बस्तर।" इस तरह बस्तर में बस्तर का न दिखना एक बेहद ही चिंताजनक बदलाव की ओर संकेत है। बस्तर को बचाए रखने की यही चिंता मैंने शाकिर अली जी के कविता संग्रह 'बचा रह जाएगा बस्तर' में महसूस किया है। बस्तर का कुटुमसर गुफा जितना भयावह है उतना ही यात्रियों के लिए आकर्षण का केंद्र भी है। गुफा की गहराई,दुर्गमता रिसता हुआ पानी,छाया अंधेरा और उन अंधेरों में अंधी मछलियों का बसेरा कुटुम सर गुफा में यह सब कुछ यात्रियों में रोमांच भर देता है। लेखक का बस्तर यात्रा तीरथगढ़ जलप्रपात एवं भारत का नियाग्रा कहे जाने वाले चित्रकूट जलप्रपात की खूबसूरती एवं अद्भुत नजारों के साथ समाप्त होता है।
                      यात्रा वृतांत के दूसरे खंड में हरिद्वार की यात्रा में विशेष तौर से हर की पौड़ी का उल्लेख करते हैं, जहां की गंगा आरती विश्व प्रसिद्ध है। यहां भक्तों को दान के अनुसार आरती में प्रमुखता मिलती है। लेखक प्रसंगवश सुरक्षा कर्मी द्वारा किए जाने वाली बदतमीजी का उल्लेख करना भी नहीं भूलते। यमुनोत्री यात्रा के दौरान यात्रियों को होने वाली परेशानी,चढ़ाई वाले रास्ते,रास्ते में बदबूदार लीद,थकान और चिड़चिड़ा हो जाने का उल्लेख है।
गंगोत्री यात्रा को लेखक ने बड़ा दिलकश बताया है। यहां जाने के रास्ते खूबसूरती के साथ खतरों से भी भरे हुए हैं। चारों तरफ बर्फीला पहाड़ और उन पर सूरज की किरणों से उभरने वाली सुनहरी रंगत बड़ा दिलकश नजारा होता है। केदारनाथ धाम की यात्रा में रास्ते की कठिन चढ़ाई, पिट्ठू पालकी घोड़े खच्चर और हेलीकॉप्टर की सवारी, केदारनाथ धाम में आई बाढ़, वीआईपी श्रद्धालुओं की प्राथमिकता और अंत में बाबा केदारनाथ के दर्शन का चित्रण हुआ है। बद्रीनाथ यात्रा में चोकता (उत्तराखंड के मिनी स्वीटजरलैंड) की खूबसूरती, कुछ पौराणिक किंवदंतियों,अलकनंदा नदी के किनारे किनारे बद्रीनाथ धाम पहुंचने, भगवान बद्रीनाथ का दर्शन करने, पंचकूला के लंगर में भोजन करने और आखिर में भारत के अंतिम गांव 'माना गांव' जाने का चित्रण किया गया है। लेखक बद्रीनाथ यात्रा के दौरान ऑली भी जाते हैं जो कि सर्दियों में स्कीइंग के लिए प्रसिद्ध है।
                     इस यात्रा वृतांत किताब के आखिरी खंड में बैगा जनजाति बहुल वनग्राम बेलापानी की यात्रा का वर्णन है। लेखक यहां की यात्रा स्थानीय साहित्यकारों के समूह के साथ करते हैं। इस यात्रा के दौरान साहित्यकार बेलापानी पहुंचकर बैगा जनजाति की संस्कृति और उनकी मूलभूत समस्याओं पर चर्चा करते हैं। लेखक के अनुसार बेलापानी अभी भी सरकारी मूलभूत सुविधाओं से अछूता है। बैगाओं द्वारा शहरी अतिथियों का मादर के धुन के साथ जोरदार स्वागत किया गया। वे मुख्य रूप से करमा नृत्य करते हैं। वे अपने आहार में मक्का बाजरा आदि मोटा अनाज लेते हैं। शराब पीना और करमा की धुन में थिरकना उनकी संस्कृति का हिस्सा है। इन सभी बातों का चित्रण इस अंश में है।
                   इस तरह एक युवा लेखक ने अपनी यात्रा के दौरान जो भी देखते है, महसूस करते हैं उन्हें शब्दशः यात्रावृत्त मे लिखते जाते हैं। डायरी की तरह लिखे इस यात्रा वृतांत में भाषा एकदम साधारण बोलचाल की है। वस्तुतः डायरी लेखन शैली और वर्णन शैली में साधारण बोलचाल की भाषा ही प्रभावकारी होती है। पाठकों को इस यात्रा वृतांत को पढ़ने से यात्रा वृतांत में वर्णित स्थलों की जानकारी, यात्रा के दौरान होने वाली परेशानियों की जानकारी एवं एक यात्री के रूप में लेखक के अनुभवों की जानकारी साथ साथ मिलती जाती है। मेरे विचार से यात्रा में रूचि रखने वाले एवं अध्ययन में रुचि रखने वाले पाठकों को यह किताब 'यात्री हो चला' जरूर पढ़नी चाहिए। निश्चित रूप से पाठक इस पुस्तक को पढ़कर लेखक के साथ उन तमाम स्थलों का जिसका इस यात्रा वृतांत में वर्णन है, वैचारिक यात्री बन सकते हैं।

-- नरेंद्र कुमार कुलमित्र
   9755852479

कृत्रिम होती जा रही है हमारी प्रकृति-03.03.22

कृत्रिम होती जा रही है हमारी प्रकृति-03.03.22
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हिंदू और मुसलमान दोनों को
ठंड में खिली गुनगुनी धूप अच्छी लगती है
चिलचिलाती धूप से उपजी लू के थपेड़े
दोनों ही सहन नहीं कर पाते

हिंदू और मुसलमान दोनों
ठंडी हवा के झोंकों से झूम उठते हैं
तेज आंधी की रफ्तार दोनों ही सहन नहीं कर पाते

हिंदू और मुसलमान दोनों को
बारिश अच्छी लगती है 
दोनों को बारिश की बूंदे गुदगुदाती है
बाढ़ के प्रकोप से
दोनों ही बराबर भयभीत होते हैं बह जाते हैं उजड़ जाते हैं

हिंदू और मुसलमान दोनों 
एक ही पानी से बुझाते हैं अपनी प्यास
दोनों को मीठा लगता है गुड़ का स्वाद
और नीम उतना ही कड़वा

दोनों को पसंद है
पेड़ पौधों और पत्तियों की हरियाली
खिले हुए फूलों के अलग-अलग रंग
और बाग में उठने वाली फूलों की अलग-अलग खुशबू

एक धरती और एक आसमान के बीच
रहते हैं दोनों
कष्ट दोनों को रुलाता है
खुशियां दोनों को हंसाती है
एक जैसे हैं दोनों के नींद और भूख

प्रकृति के गुणों को महसूस करने की प्रकृति
मैंने दोनों में समान पाया है

दोनों की प्रकृति समान है
मगर दोनों बंटे हुए हैं
कृत्रिम धर्म के लबादों में

दरअसल रोज हमें कृत्रिमता से संवारी जा रही है
हममें रोज भरे जा रहे हैं कृत्रिम भाव
धीरे-धीरे कृत्रिम होती जा रही है हमारी प्रकृति
हम अपनी प्रकृति में जीना
धीरे-धीरे भूलते जा रहे हैं।

- नरेंद्र कुमार कुलमित्र
  9755852479